श्री कल्याण पुजारी जी की जीवनी

श्री कल्याण पुजारी जी की जीवनी

परिचय :
नव किशोर दृढ़ व्रत अनन्य, मारग इक धारा । 
मधुर वचन मन हरन, सुखद जानत संसारा ॥
पर उपकार विचार, सदा करुना की रासी ।
मन-वच सर्वस रूप, भक्त-पद- रेणु - उपासी ॥
हरि-भक्ति भलाई गुन गंभीर, बाँटैं परी कल्यान के ।
धर्मदास-सुत शील सुठि, मन मान्यौं श्याम सुजान के ॥
- भक्तमाल (176)

“कल्याण पुजारी जी दृढ व्रत धारण करनेवाले भक्त हैं जो नवल किशोर श्री श्यामाश्याम के अनन्य रस-उपासक हैं । इनके मुख से मधुर वाणी निकलती थी जो सबके मन का हरण कर लेती थी एवं सुख देनेवाली थी । इनके भीतर महान करुणा थी, सदैव दूसरों का कल्याण ही विचार करते थे । ये मन, वाणी एवं क्रिया से भक्तों की चरण-रज की पूजा करते थे । धर्मदास जी के पुत्र श्री कल्याण पुजारी जी सबको भक्ति एवं परोपकार का दान करते थे । ये बड़े शील स्वाभाव के थे, जिनका मन सदैव श्री राधा कृष्ण में अटका रहता ।”
श्री कल्याण पुजारी जी का जन्म सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था । इनके पिता का नाम धर्मदास था । 

वृन्दावन आगमन एवं दीक्षा :
श्री कल्याण पुजारी जी की अभिरुचि प्रारम्भ से ही साधुओं के साथ बैठने की थी । वे साधु ही इन्हें गोस्वामी श्री वनचन्द्र जी के पास वृन्दावन लाये । उन्होंने गोस्वामी जी से सानुरोध आग्रह किया कि आप इसे (कल्याण को) अंगीकार करके अपनी शरण में ले लें । सन्तों की अनुनय विनय से दयार्द्र गोस्वामी जी ने इनके मस्तक पर अपना सुन्दर हस्त-कमल रखकर इन्हें दीक्षित किया और आश्वासन दिया कि तुम सदा हमारे पास ही रहो । इस घटना का उल्लेख स्वयं कल्याण पुजारी जी ने इन शब्दों में किया है -

जब तें जनम भयौ है मेरौ ।
तब तें मैं न कछू भलौ कीयौ, खेल्यौ विषय - अहेरौ ॥
साधुनि लै श्रीगुरुहि मिलायौ, याकौं प्रभू अएरौ ।
हरहु सकल दुख दोष-दहन तुम, कृपा-कटाक्षनि हेरौ ॥
श्रीसुन्दर कर-कमल सीस धरि, राख्यौ गहि रहि नेरौ ।
भई प्रतीति ‘कल्यान' सदा रहि, ज्यौं घर जायौ चेरौ ॥
- श्री कल्याण पुजारी जी, कल्याण पुजारी जी की वाणी (227)

जबसे मैंने जन्म लिया, तब से कुछ भी अच्छा नहीं किया, सदैव विषय भोग में खेलता रहा । साधुओं ने कृपाकर मुझे वृन्दावन में मेरे गुरु श्री वनचंद्र जी से मिलाया और मेरे लिए प्रार्थना की - "प्रभु, इसे (कल्याण पुजारी को) अपने पास सेवा में रखिये । इसके समस्त दुःख एवं दोषों का हरण कीजिये, अपनी कृपा कटाक्ष कीजिये” । श्री वनचंद्र जी ने मेरे सिर पर अपना कमल-हस्त पधराया एवं मुझे अपने पास ही रख लिया । मुझे ऐसी प्रतीति होती है की मैं सदैव से श्री गुरु का ही सेवक था ।
कल्याण पुजारी जी ने गोस्वामी वनचन्द्र जी से दीक्षा लेने के उपरान्त अनेक पदों में उनकी गुरु रूप में वन्दना भी की है ।

श्री राधावल्लभ जी की अंग-सेवा प्राप्त होना :
मंत्र दीक्षा के निकट पश्चात् ही इन्होंने अपने गुरुवर गोस्वामी श्री वनचन्द्र जी के आवास पर निवास करते हुए श्रीराधावल्लभ मन्दिर के निर्माण कार्य में श्रमिकों के साथ शारीरिक सहयोग किया; जिसके फलस्वरूप इन्हें श्रीराधावल्लभलाल जी की अंग सेवा प्राप्त हुई और ये श्री हित रसरीति के प्रेमपूर्ण प्राविधान से उनका नित्य नूतन लाड़ लड़ाने लगे । अपने परमेष्ट श्रीहित के रसिकजनों में तो इनकी अटूट श्रद्धा थी । ये उन्हें अपना प्रभु ही समझते थे । श्रीहित धर्मियों की मन-क्रम-वचन से सेवा किया करते थे । रसिकजनों की जूठन खाकर और उनका चरणोदक पान करके ही तृप्त होते थे । उनके मुख से हितवाणी और हित-सुयश सुनते थे, सुनने की सबको प्रेरणा देते थे और सदा सर्वदा इसी प्रकार की रहनी की आकांक्षा भी किया करते थे -

हरि भजनीकनि सौं हित कीजै ।
जिनके चरन-सरन सब भाँतिनु, परम सुखी ह्वै जीजै ॥
तिनकौ दासन्तनि करिकैं चरनोदक सिर धरि लीजै ।
तिनकी जूठ मीठी मोहि लागत, प्रेम प्रीति मोहि भींजै ॥
तिन मुख श्रीहरिवंश-गिरा-रस, श्रवन-पुटनि भरि पीजै ।
यह 'कल्यान' दान माँगत, श्रीव्याससुवन जू दीजै ॥
- श्री कल्याण पुजारी जी, कल्याण पुजारी जी की वाणी (43)

जिस समय गोस्वामी श्री गोपीनाथ जी के शिष्य सुन्दरदास कायथ द्वारा श्रीराधावल्लभजी के लाल प्रस्तर वाले मन्दिर का निर्माण हो रहा था उस समय आनन्दोन्मत्त कल्याण पुजारी भी मन्दिर निर्मायक श्रमिकों के साथ पूरे दिन उसी निर्माण कार्य में लगे रहते थे; किन्तु पारिश्रमिक रूप में कुछ भी नहीं लेते थे । मन्दिर निर्माण पूरा होने पर गोस्वामी श्री वनचन्द्र जी (वनमालीदास जी) ने उनसे फिर पूछा कि वास्तव में तुम क्या लेना चाहते हो? कल्याण पुजारी ने कहा कि यदि आप देना ही चाहते हैं तो अपने प्रभु की अंग सेवा प्रदान करने की कृपा करें । गोस्वामी जी ने अपने भृत्य के इस निर्हेतुक सेवा कार्य से प्रसन्न होकर इन्हें तत्काल ही श्रीराधावल्लभलाल जी की अंग सेवा प्रदान कर दी । गोविन्दअलीजी ने ‘रसिकभक्त गाथा' में इस मधुर माँग की मांगलिक कथा का सांकेतिक उल्लेख इन शब्दों में किया है -

प्रथम बन्यौं जब ऐन, चैन चित टहल विचारी ।
श्रीवनमाली गुरु बाँह पकरि, प्रभु कर में धारी ॥
अति अनन्य व्रत धारि, भाँति-भाँतिनु जु लड़ाये ।
विविध भाँति पकवान, वसन-भूषन पहिराये ॥
कल्यान पुजारी हिय लसैं, हित दम्पति चित चाय ।
ये प्रभु के हिय में बसैं, उन बिनु ये अकुलाय ॥
- श्री गोविन्द अली जी, रसिकभक्त गाथा

श्री कल्याण पुजारी जी की अपने इष्ट में अनन्यता :
कल्याण पुजारी जी की गंभीर गति वाली अनन्यता तत्कालीन महानुभावों के लिए आदर्श थी । ये अपने इष्ट श्रीराधावल्लभलाल जी के अतिरिक्त अन्य किसी मन्दिर में दर्शन करने भी नहीं जाते थे । अन्यान्य मन्दिरों में दर्शन करने वाले महानुभाव उन मन्दिरों के सुख-सौन्दर्य का वर्णन करके इनसे वहाँ न जाने का कारण जानना चाहते थे । तब कल्याण पुजारी जी अत्यन्त ही मृदुल शब्दों में उन्हें समझाते हुए कहा करते थे कि अरे भैया! सदा सर्वदा एकमात्र अपने इष्ट का ही दर्शन करना चाहिये क्योंकि यदि अन्य मन्दिरों में अपने यहाँ से कुछ अधिक ऐश्वर्य दिखलाई देगा तो अपने इष्ट के प्रति न्यूनता का भाव प्रकट हो जायेगा और यदि अन्यत्र कुछ न्यूनता दिखलाई दी तो वहाँ दुर्भाव होने की आशंका उत्पन्न होगी । इस प्रकार दोनों स्थितियों में अपना ही मन मैला होगा । अतः अपने इष्ट के मन्दिर में ही दर्शन करने चाहिये । वास्तव में जो सच्चे और टकसाली अनन्य रसिक हैं, वे श्रीराधाचरण प्रधान उपासना स्थल में ही सुख प्राप्त करते हैं; अन्यत्र नहीं -

और पुजारी की इक बात । इष्ट-दरस तजि अनत न जात ॥
जे-जे अनत दरस करि आवैं । इनके आगे वरनि सुनावैं ॥
तब ये कहैं प्रिया के चरन । देखे कहूँ पियहि सुख करन ॥
अपने इष्टहि देख्यौ कीजै । और कहूँ मन जान न दीजै ॥
जो ह्वाँ सुख-सम्पति अधिकाई । अपने लखि मानिये घटाई ॥
जो कोउ बात ह्वाँ घटि दीसै । तौ अपराध लगै निजु सीसै ॥
दुहूँ भाँति मन मैलौ होई । पतिव्रत तजि भटकौ जिन कोई ॥
घटती-बढ़ती कहुँ न विचारैं । इक ठाँ अपनौं इष्ट निहारै ॥
प्रिया-चरन जहाँ नहीं प्रधान । सुख न लहैं तहँ रसिक सुजान ॥
ऐसे निष्ठावान हे, कल्यानपुजारी धीर ।
को जानैं 'भगवन्त', यह आशय गति गंभीर ॥
- भगवत मुदित जी, रसिक अनन्य माल

वृन्दावन में श्री कल्याण पुजारी जी की रहनी :
कल्याण पुजारी जी ने अपनी वाणी में वृन्दावन की रहनी का उल्लेख किया है -

तजि अभिमान अरे मूरख ! अज्ञानी नर,
वृन्दावन कन-कन माँगि कर-सरवा ।
ओढ़ि तन गूदरी गरूरता दै छाँड़ि सठ !
कनक-कलश तजि माटी कौ लै करुवा ॥
रसिकनि की जूठनि खाहु सुजस सुनहु अघाहु
ह्वै रहि निशंक, शंक काहू की न परवा ।
भये हैं ‘कल्यान’ ते विराजमान सर्वोपरि,
जिन जन सेये श्रीवनचन्दजू के तरवा ॥
- श्री कल्याण पुजारी जी, कल्याण पुजारी जी की वाणी (226)

अरे मुर्ख ! अज्ञानी, अपने अभिमान का त्याग कर श्री वृन्दावन में मधुकरी मांग कर जीवन का निर्वाह कर । अरे शठ, अपने गर्व को छोड़ दे एवं गुदड़ी धारण कर । स्वर्ण के लोभ को छोड़ मिट्टी का करुवा ले । रसिकों की जूठन खा, इष्ट के सुयश का श्रवण कर ।निशंक हो कर रह, किसी की कोई परवा न कर । रसिकों की सभा में विराजमान सर्वोपरि श्री वनचंद्र जू की शरण जिसने ग्रहण कर ली उसका निश्चित कल्याण हो जायेगा ।

श्री राधावल्लभ जी का श्री कल्याण पुजारी जी से प्रेम :
श्री कल्याण पुजारी जी की स्वेष्ट के रसिक भक्तों में भी अद्वितीय श्रद्धा थी । वे नित्यप्रति श्रीराधावल्लभलालजी को हार्दिक प्रीति से भोग लगाकर रसिक सन्तों को जिमाते थे और स्वयं उनके उच्छिष्ट प्रसाद के साथ उनका चरणामृत लेते थे । विधिनिषेध को ही सर्वोत्तम मानने वाले कोई-कोई व्यक्ति इनकी इस क्रिया से अप्रसन्न होने लगे । अप्रसन्न होने वाले वर्ग ने अपना दुख तत्कालीन सेवाधिकारी गोस्वामी श्री दामोदरवर जी से प्रकट किया; किन्तु गोस्वामी जी ने कल्याण पुजारी जी की बात का ही समर्थन करते हुए उन व्यक्तियों को समझाया कि भक्त और भगवान एक ही हैं और यह सिद्धान्त शास्त्र सम्मत है ।
इन चुगलखोरों ने अपनी बात न्यून होती देखकर गोस्वामी श्री दामोदरवर जी के पुत्र रासदास और विलासदास को अपने पक्ष में कर लिया । वे दोनों भी एक दिन अपने पिताश्री से कल्याण पुजारी को मन्दिर की सेवा से अलग करने का हठ करने लगे । गोस्वामी श्री दामोदरवर जी ने तो अपने पुत्रों की बात अनसुनी कर दी किन्तु कल्याण पुजारी ने उदास होकर स्वयं ही निज मन्दिर की चाबी गोस्वामी श्री दामोदरवर जी को दे दी । उस दिन श्रीजी की सेवा किसी दूसरे ने ही की; परन्तु श्रीजी ने उस पुजारी में हार्दिक प्रीति का अभाव देखकर उसकी सेवा स्वीकार ही नहीं की । उन्होंने गोस्वामी श्री दामोदरवर जी से स्वप्न में कहा कि हम कल्याण के बिना अत्यन्त दुखित और भूखे हैं । वही हमें जब प्रीतिपूर्वक भोग अर्पित करेगा तभी हम सेवा स्वीकार करेंगे । श्रीराधावल्लभलाल जी का यह स्वप्नादेश प्रातःकाल गोस्वामी श्री दामोदरवर जी ने सबको सुनाया और कल्याण पुजारी को बुलाकर इन्हें श्रीजी की अंग सेवा पुनः प्रदान कर दी, जिसे वे उनके पितामह गोस्वामी श्री वनचन्द्र जी की आज्ञा से बहुत वर्षों पूर्व 1584 से ही करते चले आ रहे थे । गोस्वामी श्री दामोदरवर जी ने कल्याण पुजारी से यह भी कहा कि तुम जिस प्रकार श्रीजी की सेवा करते थे उसी प्रकार करो और रसिक भक्तों के प्रति अपनी निष्ठा में पूर्ववत् स्थिर बने रहो -

इक दिन रास-विलास जु ऐसैं । कही पिता सौं हठ करि वैसैं ॥
महा भ्रष्ट यह भयौ पुजारी । यह सेवा कौ नहिं अधिकारी ॥
सुनि कल्यान गये गुरु पास । तारी सौंपी भये उदास ॥
ता दिन सेवा औरनि कीनी । प्रीति बिना प्रभु जू लखि लीनी ॥
सुपन गुसाईं सौं कही भूखे । कल्यान बिना हम अति ही दूखे ॥
सेवा राग-भोग की रीति । वाकी सी कोउ करै न प्रीति ॥
भक्तनि में मोमैं नहिं भेद । बोलि कल्यानहि हरि मन खेद ॥
करि सेवा वह भोग लगावै । तौ हम जेवैं और न भावै ॥
यौं श्रीदामोदर सौं बोले । जागे जाइ कपाट जु खोले ॥
सबनि सुनत कल्यान बुलायौ । प्रभु जू कह्यौ सो कहि समुझायौ ॥
ज्यौं तुम करत हुते त्यौं करौ । अपनी निष्ठा तें जिन टरौ ॥
- भगवत मुदित जी, रसिक अनन्य माल

रचना :
श्री कल्याण पुजारी जी ने अनेक कवित्त-सवैया, चौपाई, छप्पय, मंगल आदि छन्दों के साथ-साथ गेय पद की भी रचना की है जो "कल्याण पुजारी जी की वाणी" ग्रन्थ में संकलित है और इसकी कुल संख्या 236 है । 
श्री कल्याण पुजारी जी ने अपनी वाणी में 'कल्यान', 'कल्यानदास', 'हित कल्यान’, ‘कल्यानदासि’, ‘दासि कल्यान' के साथ-साथ 'कली' और 'कली अली' छाप भी प्रयुक्त किये हैं ।

निकुंज गमन :
कल्याण पुजारी जी के निकुंज गमन की तिथि तो अज्ञात है किन्तु गोस्वामी श्री जतनलाल जी कृत ‘रसिक अनन्य सार' के आधार पर इतना अवश्य ज्ञात होता है कि इन्होंने श्रीराधावल्लभलाल जी की आरती करते-करते ही अपने प्राण विसर्जन कर दिये थे -

अपने रँगभीने सदा, इष्ट गुननि सौं प्रीति ।
निशि-दिन मन्दिर में रहैं, धनि कल्यान प्रतीति ॥
अँग सेवा प्रभु करैं, टरैं मन्दिर तें नाहीं ।
रूप माधुरी मगन, नित्य दम्पति सुख माँहीं ॥
दरसन रहैं अनेक, एक अपने रँगभीने ।
इष्ट प्रसादहि लैहिं, और दूजौ नहिं चीन्हे ॥
महा अनन्य उदार चित, वानी हितजी की सज्यौ ।
श्रीराधाबल्लभ आरती, करत कल्यान जु तन तज्यौ ॥
- गोस्वामी श्री जतनलाल जी, रसिक अनन्य सार