लडैती तेरी कृपा कहिय न जाइ ।
छिन छिन प्रति अति पोषत तोषत आनंद उर न समाइ ॥ [1]
अपनी कहि कहि रंग बढावत हँसि हँसि कंठ लगाइ ।
श्री हरिदासी रसिक सिरोमनि छकी रहें महा भाइ ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (139)
लड़ैती जू (श्री राधा जू) की कृपा कहते नहीं बनती, जो हर क्षण मुझे अपनी कृपा दृष्टि से पोषण कर अपने अति अद्भुत रस का वर्षण करती हैं जिसका अपार आनंद मेरे ह्रदय में समाता नहीं । [1]
श्री राधा मेरे नेह के रंग को नित्य बढ़ाती हैं यह कहकर कि "तू मेरी है" एवं हंस-हंस कर मुझे अपने कंठ से लगाती हैं । श्री राधा के महान प्रेम रस में रसिक शिरोमणि श्री हरिदासी (ललिता सखी) नित्य ही छकी रहती हैं । [2]
श्री राधा मेरे नेह के रंग को नित्य बढ़ाती हैं यह कहकर कि "तू मेरी है" एवं हंस-हंस कर मुझे अपने कंठ से लगाती हैं । श्री राधा के महान प्रेम रस में रसिक शिरोमणि श्री हरिदासी (ललिता सखी) नित्य ही छकी रहती हैं । [2]

