प्यारी मन भावै सो कीजै ।
परवस परो नही बस मेरो, चरण कमल चित दीजै ॥ [1]
जो कछु करो होत है सोई, दीन जान उर लीजै ।
तुमरे धाम कमी काहे की बौरी एक गनीजै ॥ [2]
तुमही दास दासिन की महल टहल उर भीजै ।
प्रेमसखी की अहो स्वामिनी तुम निरखत छिन छीजै ॥ [3]
- श्री प्रेम सखी जी
हे श्री प्यारी जू (राधे), जैसी आपको रुचे वैसा ही कीजिये । मेरे मन मेरे वश में नहीं है, कृपया इसे अपने चरण कमलों में लगा लीजिये । [1]
जो आप करती हो बस वही होता है, इसलिए मुझे दीन समझकर मेरे ह्रदय में प्रकाश कीजिये । आपके धाम श्री वृन्दावन में किस बात की कमी है, मुझ बावरी को भी कुछ स्थान दे दीजिए । [2]
आप ही अपनी दासियों को निज महल की सेवा प्रदान करनेवाली हो । श्री प्रेम सखी जी कहते हैं कि "हे मेरी स्वामिनी श्री राधे! ऐसी कृपा हो कि आपको निहारते हुए ही मेरा प्रत्येक क्षण व्यतीत हो ।" [3]
परवस परो नही बस मेरो, चरण कमल चित दीजै ॥ [1]
जो कछु करो होत है सोई, दीन जान उर लीजै ।
तुमरे धाम कमी काहे की बौरी एक गनीजै ॥ [2]
तुमही दास दासिन की महल टहल उर भीजै ।
प्रेमसखी की अहो स्वामिनी तुम निरखत छिन छीजै ॥ [3]
- श्री प्रेम सखी जी
हे श्री प्यारी जू (राधे), जैसी आपको रुचे वैसा ही कीजिये । मेरे मन मेरे वश में नहीं है, कृपया इसे अपने चरण कमलों में लगा लीजिये । [1]
जो आप करती हो बस वही होता है, इसलिए मुझे दीन समझकर मेरे ह्रदय में प्रकाश कीजिये । आपके धाम श्री वृन्दावन में किस बात की कमी है, मुझ बावरी को भी कुछ स्थान दे दीजिए । [2]
आप ही अपनी दासियों को निज महल की सेवा प्रदान करनेवाली हो । श्री प्रेम सखी जी कहते हैं कि "हे मेरी स्वामिनी श्री राधे! ऐसी कृपा हो कि आपको निहारते हुए ही मेरा प्रत्येक क्षण व्यतीत हो ।" [3]

