चम्पक वरनी मनहरनी कहूँ रस सुधा सिन्धु में सानी कहूँ ।
राधा बाधा हर नाम कहूँ या कीर्ति कुँवरि जग जानी कहूँ ॥ [1]
शोभा की सीवाँ रूप अवधि, गुण गर्व गहेली रानी कहूँ ।
'शीतल' भव बाधा सहज तरै, ब्रजरानी कहूँ ब्रजरानी कहूँ ॥ [2]
- श्री शीतल जी
हे श्री राधे! मैं तुमको चंपक वरनी [चंपक वर्ण वाली] कहूँ, मन हरनी [मन का हरण करने वाली] कहूँ या रसामृत-सागर की स्रोत कहूँ । हे राधा! क्या मैं तुमको बाधा हरण करने वाली कहूँ या कीर्ति कुमारी कहूँ जिस नाम से संपूर्ण विश्व आपको जानता है । [1]
क्या मैं तुमको शोभा की सीमा कहूँ, रूप की अवधि कहूँ, या गुण गर्वीली महारानी कहूँ । श्री शीतल जी कहते हैं कि "तुम्हारी कृपा से मैं सहज ही समस्त बाधाओं से उत्तीर्ण हो गया हूँ, क्या मैं तुमको ब्रज की रानी कहूँ?" [2]
राधा बाधा हर नाम कहूँ या कीर्ति कुँवरि जग जानी कहूँ ॥ [1]
शोभा की सीवाँ रूप अवधि, गुण गर्व गहेली रानी कहूँ ।
'शीतल' भव बाधा सहज तरै, ब्रजरानी कहूँ ब्रजरानी कहूँ ॥ [2]
- श्री शीतल जी
हे श्री राधे! मैं तुमको चंपक वरनी [चंपक वर्ण वाली] कहूँ, मन हरनी [मन का हरण करने वाली] कहूँ या रसामृत-सागर की स्रोत कहूँ । हे राधा! क्या मैं तुमको बाधा हरण करने वाली कहूँ या कीर्ति कुमारी कहूँ जिस नाम से संपूर्ण विश्व आपको जानता है । [1]
क्या मैं तुमको शोभा की सीमा कहूँ, रूप की अवधि कहूँ, या गुण गर्वीली महारानी कहूँ । श्री शीतल जी कहते हैं कि "तुम्हारी कृपा से मैं सहज ही समस्त बाधाओं से उत्तीर्ण हो गया हूँ, क्या मैं तुमको ब्रज की रानी कहूँ?" [2]

