(राग विहाग व काफी)
आसरो श्यामा जु आप चरण को ।
होय निश्चिन्त रहूँ अब तो मैं, भय नहिं जनम मरन को ॥ [1]
बाट निहारत रहूं कृपा की, येहि इक जतन तरन को ।
जप तप नेम साधना नाहीं, है बल मोहि शरन को ॥ [2]
तुम्हरो दृढ़ विश्वास भयो उर, याचूँ न देव नरन को ।
“रूपमाधुरी” प्रीत निभाज्यो, तजियो नाहिं परन को ॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (112)
हे श्री श्यामा जू, आपके चरण कमल ही मेरे लिए एकमात्र आश्रय हैं । इसी आश्रय से अब मैं निश्चिन्त रहता हूँ, मुझे अब जन्म-मृत्यु का भी भय नहीं है । [1]
आपकी कृपा की प्रतीक्षा करता रहूँ, बस यही मेरे कल्याण का एकमात्र उपाय है । मुझे अब न जप का बल है न तप का, न नियम का न साधना का, मुझे तो अब एकमात्र आपके शरण का ही बल है । [2]
मेरे ह्रदय में आपके प्रति दृढ विश्वास हो गया है, अब मैं न किसी देवता से याचना करता हूँ न किसी मनुष्य से । श्री रूप माधुरी जी प्रार्थना करते हैं, "हे श्री राधे, अब आप भी प्रेम का निर्वाह कीजिये क्योंकि आप अपने आश्रितजनों पर अवश्य कृपा दृष्टि करती हैं, मुझे विश्वास है कि आप इस प्रण का त्याग नहीं करेंगी"। [3]

