श्री परमानंददास जी ब्रज के रसिक संत थे और पुष्टिमार्ग के अष्टछाप कवियों में से एक थे । श्री परमानंद दास जी अपने द्वारा रचित छंदों का बड़े मधुर राग में गान और कीर्तन करते थे ।
एक दिन श्री परमानंददास जी गुसाईं श्री विठ्ठलनाथ जी को प्रणाम करके गोवर्धन पर्वत पर चढ़े और शरीर त्यागने की इच्छा से श्री गोवर्धननाथ जी की ध्वजा को प्रणाम कर सुरभि कुण्ड में आये जहाँ वे लेट गये । श्री गुसाईं विठ्ठलनाथ जी भी उनका हाल जानने सुरभि कुण्ड पधारे । श्री गुसाईंजी को देखकर श्री परमानंद दास जी ने श्री गुसाईंजी को प्रणाम किया और राग सारंग में "राधे बैठी तिलक सव आरती" गाई और श्री राधा कृष्ण के रूप में मन को एकाग्र करते हुए श्री परमानंददास जी ने 1584 में देह त्याग दिया ।
स्थान :
श्री परमानंददास जी का भजन एवं समाधि स्थल सुरभि कुंड, गोवर्धन में स्थित है ।

