(राग श्री)
प्यारीजू प्यारेकौं भावै सो सहज करैं,
करैं सोई प्यारे जो भावै प्यारी कौं सदा । [1]
तन सों तन मन सों मन प्रान सों प्रान विक्री कियौ,
जीवत न बिना देखें कोऊ कबहुं एकदा ॥ [2]
प्यारी कौं पाय कें प्यारौ भयौ महाधनी,
प्यारी हू प्यारे कों मानैं निज सम्पदा ! [3]
जय जय श्रीरामराय श्री अनङ्गमञ्जरी के पाय,
परि परि पाई जुगल रसिक प्रेम सम्प्रदा ॥ [4]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (1)
प्यारीजू प्यारेकौं भावै सो सहज करैं,
करैं सोई प्यारे जो भावै प्यारी कौं सदा । [1]
तन सों तन मन सों मन प्रान सों प्रान विक्री कियौ,
जीवत न बिना देखें कोऊ कबहुं एकदा ॥ [2]
प्यारी कौं पाय कें प्यारौ भयौ महाधनी,
प्यारी हू प्यारे कों मानैं निज सम्पदा ! [3]
जय जय श्रीरामराय श्री अनङ्गमञ्जरी के पाय,
परि परि पाई जुगल रसिक प्रेम सम्प्रदा ॥ [4]
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (1)
प्यारे श्री श्यामसुंदर को जो भाता है, वही प्यारी श्री राधा सहज में करती हैं एवं प्यारी श्री राधा को जो सदैव भाता है, वही प्यारे श्री श्यामसुंदर करते हैं । [1]
दोनों श्री श्यामाश्याम ने एक-दूसरे को अपने तन, मन एवं प्राण बेच दिए हैं, दोनों एक-दूसरे को देखे बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते । [2]
प्यारी श्री राधा को पाकर प्यारे श्री श्यामसुंदर महाधनी हो गए हैं एवं प्यारे श्यामसुंदर को प्यारी श्री राधा अपनी निज संपत्ति मानती हैं । [3]
श्री रामराय जी कहते हैं कि "श्री अनंगमञ्जरी के चरण कमलों की जय हो, जिनकी शरण ग्रहण करने से मुझे युगल किशोर श्री श्यामाश्याम का प्रेम प्राप्त हो गया है ।" [4]

