जो सुख होत गोपालहिं गायैं - श्री सूरदास, सूरसागर

जो सुख होत गोपालहिं गायैं - श्री सूरदास, सूरसागर

(राग सारंग)
जो सुख होत गोपालहिं गायैं ।
सो न होत जप-तप के कीनैं, कोटिक तीरथ नहायैं ॥ [1]
दिये लेत नहिं चारि पदारथ, चरन कमल चित लायैं ।
तीन लोक तृन सम करि लेखत, नंदनंदन उर आयैं ॥ [2]
वंशीवट, वृन्दावन, यमुना तजि बैकुंठ न जायैं ।
सूरदास हरि को सुमिरन करि, बहुरि न भवजल आवैं ॥ [3]

- श्री सूरदास, सूरसागर

श्री कृष्ण का प्रेमपूर्वक कीर्तन करने से जो सुख (रस) प्राप्त होता है, वह जप, तपस्या और करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नहीं प्राप्त होता । [1]

जिसके चित्त में श्री कृष्ण के चरण कमल विराजमान हो जाते हैं वह इस संसार के चार पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) भगवान द्वारा प्रदान किए जाने पर भी स्वीकार नहीं करते हैं । जिनके ह्रदय में श्री कृष्ण का निवास हो जाता है वे तीनों लोकों से प्राप्त सुख को भी तृण के समान मानते हैं । [2]

ऐसे भक्त वंशीवट, वृंदावन और यमुना पुलिन को छोड़कर वैकुंठ धाम [जहां भगवान विष्णु निवास करते हैं] जाने की भी इच्छा नहीं रखते । श्री सूरदास जी कहते हैं कि "अरे मन श्री कृष्ण का सुमिरन कर क्योंकि अनेक भक्त उनका सुमिरन कर फिर पुनः इस भव-सागर में नहीं आए ।" [3]