सुख की संधि समझे बिना, परे महा दुख द्वंद ।
चतुरसखी कोउ समुझही, तब होइ परमानंद ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (5)
सुख की संधि (श्रीधाम वृन्दावन) में अहर्निश चलने वाले नित्यविहार का ज्ञान न होने के कारण ही लोग सुख-दु:ख, लाभ-हानि और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों के सागर में डूब-उतर रहे हैं और भारी कष्ट भोग रहे हैं। कोई-कोई चतुरसखी ही इस वास्तविक स्वरूप को समझ पाती है और परम आनंद को प्राप्त करती है।
चतुरसखी कोउ समुझही, तब होइ परमानंद ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (5)
सुख की संधि (श्रीधाम वृन्दावन) में अहर्निश चलने वाले नित्यविहार का ज्ञान न होने के कारण ही लोग सुख-दु:ख, लाभ-हानि और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों के सागर में डूब-उतर रहे हैं और भारी कष्ट भोग रहे हैं। कोई-कोई चतुरसखी ही इस वास्तविक स्वरूप को समझ पाती है और परम आनंद को प्राप्त करती है।

