जात जात मैं सब, सबही जात कुजात - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20)

जात जात मैं सब, सबही जात कुजात - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20)

जात जात मैं सब, सबही जात कुजात ।
रसिक अनन्य अजात की कहौ कौन सी जात ॥ [1]
कहौ कौन सी जात, सजाती मिलै सु जानै ।
बिमुख बिजाती देह खेह की जात बखानै ॥ [2]
निज स्वरूप नहिं, लखे बिबादी बात बात मैं ।
भगवत भक्त ने लेय, जक्त सब जात जात मैं ॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20)

जाति जाति करते सब कुछ चला ही जाता है और अंत में सभी जातियाँ कुजाति सिद्ध होती है। कहिये तो, जाति बंधन से मुक्त अनन्यरसिक की भला कौन सी जाति होती है? (यदि उसकी कोई जाति है, तो वह है अनन्यरसिक) [1]

इस अनन्यरसिकता की पहचान भी सजातीय अनन्यरसिक को ही होती है। जो अनन्यरसिक नहीं हैं ऐसे विमुख विजातीय व्यक्ति (अनन्यरसिक को नहीं पहचान सकते और वे) मिटटी तुल्य इस शरीर की जाति का ही वखान करते रहते हैं । [2]

भगवतरसिक जी कहते हैं कि जो (भक्ति का चोगा ओढ लेने पर भी) आत्म स्वरूप को नहीं देख पाते हैं और बात बात में वाद विवाद करने लगते हैं, वे वस्तुतः भक्त हैं ही नहीं । इस प्रकार जिसको आत्म स्वरूप का बोध हो गया है ऐसे कुछ महानुभवों को छोडकर प्रायः) सारा संसार ही किसी न किसी प्रकार की जाति के दायरे में बंद होकर दम तोडे जा रहा है । [3]