लटकि रहै मन लटकी लट सौं ।
रंग भरी छिन अनत न जावै, रंग भरे जमुना तट सौं ॥ [1]
मान करत रँग भरी बधूटी, रंग भरे नागर नट सौं ।
पिय कर जोर निहोरत 'भोरी', छ्वै-छ्वै चरण मुकुट सौं ॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (32)
श्री प्रिया जी के मुखारविन्द पर आ गई घुँघराली अलकों में श्री लाल जी का मन झूलता-झूमता रहता है । प्रेम के रंग में रँगी हुई श्री प्रिया जी, विविध प्रकार के रंगों से भरे हुए यमुना के किनारे को, एक क्षण के लिये भी छोड़कर, अन्यत्र कहीं नहीं जाती हैं । [1]
प्रेम के रंग में सराबोर वह दुलहिनी श्री राधा, प्रीति के रंग में रंजित नटनागर श्री श्यामसुन्दर से मान करने का नाटक किया करती हैं । श्री भोरी सखी जी कहती हैं कि "प्रियतम श्री श्यामसुन्दर भी अपने दोनों हाथ जोड़कर एवं अपने मोर मुकुट को उनके चरणों में बार-बार डालकर, उनसे मान न करने की प्रार्थना किया करते हैं ।” [2]
रंग भरी छिन अनत न जावै, रंग भरे जमुना तट सौं ॥ [1]
मान करत रँग भरी बधूटी, रंग भरे नागर नट सौं ।
पिय कर जोर निहोरत 'भोरी', छ्वै-छ्वै चरण मुकुट सौं ॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (32)
श्री प्रिया जी के मुखारविन्द पर आ गई घुँघराली अलकों में श्री लाल जी का मन झूलता-झूमता रहता है । प्रेम के रंग में रँगी हुई श्री प्रिया जी, विविध प्रकार के रंगों से भरे हुए यमुना के किनारे को, एक क्षण के लिये भी छोड़कर, अन्यत्र कहीं नहीं जाती हैं । [1]
प्रेम के रंग में सराबोर वह दुलहिनी श्री राधा, प्रीति के रंग में रंजित नटनागर श्री श्यामसुन्दर से मान करने का नाटक किया करती हैं । श्री भोरी सखी जी कहती हैं कि "प्रियतम श्री श्यामसुन्दर भी अपने दोनों हाथ जोड़कर एवं अपने मोर मुकुट को उनके चरणों में बार-बार डालकर, उनसे मान न करने की प्रार्थना किया करते हैं ।” [2]

