रंगमहल राज रहे राधिका विहारी - श्री सरस माधुरी जी

रंगमहल राज रहे राधिका विहारी - श्री सरस माधुरी जी

रंगमहल राज रहे राधिका विहारी ।
हिलमिल लपटाय रहे, हंस हंस मुसकाय रहे,
मंद मधुर गाय रहे, मदन मनोहारी । [1]
छतियन सों, लागि रहे, बतियन रस पागि रहे,
अति ही अनुराग रहे, आनंद मन भारी ॥ [2]
नख शिख श्रृंगार किये, मादक रस प्रेम पिये,
घूमत हैं नैन निकट प्रेम के अहारी । [3]
निरखत दंपति विलास, सखी खडी आस पास,
'सरसमाधुरी' सुदृष्टि टरत नाहिं टारी ॥ [4]

- श्री सरस माधुरी जी

दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण रंग महल में विराज रहे हैं । वे दोनों हिल मिल कर एक दूसरे से लिपट रहे हैं, हँस खेल रहे हैं, मंद मंद गान कर रहे हैं जिसकी दिव्य छटा ने कामदेव के मन का भी हरण कर लिया है । [1]

वे दोनों एक दूसरे को ह्रदय से लगाये हुए, रस भरी बातें करते हुए, अति ही अनुराग में भरकर आनंद की वर्षा कर रहे हैं । [2]

दंपति ने नख से शिख तक श्रृंगार कर, प्रेम रस का ही प्याला पीकर, अपने नैनों को एक दूसरे पर ही टिकाये हुए कीवल प्रेम का ही आहार (आदान प्रदान) कर रहे हैं । [3]

श्री सरस माधुरी रूपी सखी इस दिव्य दंपति के निकट खड़ी दंपति विलास का अवलोकन इस भाँति कर रही है कि उनकी दृष्टि एक क्षण को भी इस दंपति से हटती नहीं । [4]