पततु मदुपरिष्ठात् कोटिशो वज्रपातः - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.39)

पततु मदुपरिष्ठात् कोटिशो वज्रपातः - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.39)

पततु मदुपरिष्ठात् कोटिशो वज्रपातः सकलभुवनदाही वह्निरभ्युत्थितोऽस्तु ।
उदयतु लयकालोच्चण्डर्तण्डकोटिर्न खलु तदपि वृन्दाकाननं त्यक्तुमीशे ॥

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.39)

मेरे ऊपर कोटि-कोटि वज्रपात हों और समस्त भुवनों को जला देने वाली अग्नि ही उत्थित हो जाय, अथवा प्रलयकालीन कोटि-कोटि प्रचण्ड सूर्य ही उदिन हो उठे, तथापि श्रीवृन्दावन को त्याग करने के लिए मैं कभी तैयार नहीं हूँगा ।