प्रगटी नागरि रूप-निधान - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (8)

प्रगटी नागरि रूप-निधान - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (8)

(राग गंधार)
प्रगटी नागरि रूप-निधान ।
निरखि-निरखि फूलति व्रज- वनिता नांहिन उपमा कों आन ॥ [1]
उपमा कों जे जे कहियतु हैं ते जु भए निरवान ।
'कुंभनदास' लाल गिरिधर की जोरी सहज समान ॥ [2]

- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (8)

सुंदरता की निधि नागरी श्री राधा का प्राकट्य हुआ है । जिनकी रूप-माधुरी का नेत्रों से पान कर सखियाँ हर्षित हो रही हैं, उन श्री राधा के सुंदरता की कहीं कोई उपमा नहीं है । [1]

श्री राधा उपमा रहित हैं और उनकी किसी से तुलना करने का प्रयास भी नगण्यता को प्राप्त करना है । श्री कुम्भनदास जी कहते हैं कि "गिरिधर श्री कृष्ण एवं श्री राधा की जोड़ी सहज में एक समान है ।" [2]