जाके लिये सिंधु मथ्यौ करिकें जु श्रम भारी,
ताकी छटा जग में भई प्रकाशमान हैं। [1]
तन सुख त्यागें नर ताके काजें तप करें,
देव ओ अदेव चहैं कृपा सरसान हैं॥ [2]
ब्रह्म विश्व जानी वैकुंठरानी सर्वोपरि,
नागर कहाँ करों प्रभुता बखान हैं। [3]
ऐसी ये रमा सो जाके पायँन पलोटै,
सो राधा पद जावक की सेवामें सुजान है॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)
जिनके लिए बड़ा भारी श्रम करके समुद्र मंथन किया गया, उन श्री लक्ष्मी जी की छटा समस्त जगत में प्रकाशमान हुई। [1]
श्री लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त करने के लिए अनेक मनुष्य शरीर के सुख का त्याग कर तपस्या करते हैं। देवता और असुर भी उनकी पूर्ण कृपा की अभिलाषा रखते हैं। [2]
समस्त ब्रह्मांड वैकुण्ठरानी श्री लक्ष्मी जी को सर्वोपरि मानता है। उनके प्रभुत्व का बखान करना तो असंभव है। [3]
ऐसी रमा (श्री लक्ष्मी जी), जिनके चरणों की सेवा में सभी संग्लग्न रहते हैं, उनके स्वामी श्री हरि स्वयं श्री राधा के चरण कमलों की ध्यानपूर्वक सेवा करते हैं और उन चरणों में महावर लगाते हैं। [4]
ताकी छटा जग में भई प्रकाशमान हैं। [1]
तन सुख त्यागें नर ताके काजें तप करें,
देव ओ अदेव चहैं कृपा सरसान हैं॥ [2]
ब्रह्म विश्व जानी वैकुंठरानी सर्वोपरि,
नागर कहाँ करों प्रभुता बखान हैं। [3]
ऐसी ये रमा सो जाके पायँन पलोटै,
सो राधा पद जावक की सेवामें सुजान है॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)
जिनके लिए बड़ा भारी श्रम करके समुद्र मंथन किया गया, उन श्री लक्ष्मी जी की छटा समस्त जगत में प्रकाशमान हुई। [1]
श्री लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त करने के लिए अनेक मनुष्य शरीर के सुख का त्याग कर तपस्या करते हैं। देवता और असुर भी उनकी पूर्ण कृपा की अभिलाषा रखते हैं। [2]
समस्त ब्रह्मांड वैकुण्ठरानी श्री लक्ष्मी जी को सर्वोपरि मानता है। उनके प्रभुत्व का बखान करना तो असंभव है। [3]
ऐसी रमा (श्री लक्ष्मी जी), जिनके चरणों की सेवा में सभी संग्लग्न रहते हैं, उनके स्वामी श्री हरि स्वयं श्री राधा के चरण कमलों की ध्यानपूर्वक सेवा करते हैं और उन चरणों में महावर लगाते हैं। [4]

