कुँवरि बिनु, अब तो रह्यो न जाय ।
कोटिन प्रान निछावर वापै, जो कोउ लाय मनाय ॥ [1]
सुनु ललिते! तू चतुर-शिरोमणि, पुनि प्यारिहुँ मनभाय ।
याते राखि लेहु अब प्रानन, परूँ तिहारे पाय ॥ [2]
'हा! हा!' खाउँ, बलैयाँ लेऊँ, तव कर जाउँ बिकाय ।
लै 'कृपालु' मोहिं मोल बार इक, कुँवरि-चरन दिखराय ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, मान माधुरी (28)
( किशोरी जी के वियोग में प्रियतम श्यामसुन्दर का विलाप ।)
हाय ! हाय !! किशोरी जी के बिना अब तो किसी प्रकार भी रहा नहीं जाता । अरी सखियों ! जो कोई किशोरी जी को मना लाये उस पर मैं अपने करोड़ों प्राण न्यौछावर कर दूँगा । [1]
अरी ललिते ! सुन, तू इन कार्यों में अत्यन्त ही चतुर है तथा किशोरी जी को भी अत्यन्त मनभाई है अतएव मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ । तू ही मेरे निकलते हुए प्राणों को बचा ले । [2]
अरी ललिता ! मैं बार-बार तेरी हा हा खाता हूँ एवं बलैया लेता हूँ । कहाँ तक कहूँ, मैं तेरे हाथ सदा के लिए बिकने को भी तैयार हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे मोल लेकर केवल एक बार किशोरी जी के चरण-कमलों का दर्शन करा दे । [3]
कोटिन प्रान निछावर वापै, जो कोउ लाय मनाय ॥ [1]
सुनु ललिते! तू चतुर-शिरोमणि, पुनि प्यारिहुँ मनभाय ।
याते राखि लेहु अब प्रानन, परूँ तिहारे पाय ॥ [2]
'हा! हा!' खाउँ, बलैयाँ लेऊँ, तव कर जाउँ बिकाय ।
लै 'कृपालु' मोहिं मोल बार इक, कुँवरि-चरन दिखराय ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, मान माधुरी (28)
( किशोरी जी के वियोग में प्रियतम श्यामसुन्दर का विलाप ।)
हाय ! हाय !! किशोरी जी के बिना अब तो किसी प्रकार भी रहा नहीं जाता । अरी सखियों ! जो कोई किशोरी जी को मना लाये उस पर मैं अपने करोड़ों प्राण न्यौछावर कर दूँगा । [1]
अरी ललिते ! सुन, तू इन कार्यों में अत्यन्त ही चतुर है तथा किशोरी जी को भी अत्यन्त मनभाई है अतएव मैं तेरे पाँव पड़ता हूँ । तू ही मेरे निकलते हुए प्राणों को बचा ले । [2]
अरी ललिता ! मैं बार-बार तेरी हा हा खाता हूँ एवं बलैया लेता हूँ । कहाँ तक कहूँ, मैं तेरे हाथ सदा के लिए बिकने को भी तैयार हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे मोल लेकर केवल एक बार किशोरी जी के चरण-कमलों का दर्शन करा दे । [3]

