मैं तौ हूँ गँवार - सरसदासी लाडीवाल

मैं तौ हूँ गँवार - सरसदासी लाडीवाल

(कवित्त)
मैं तौ हूँ गँवार प्रेम-रस की न जानूँ सार,
तन-मन फँसे पंक बासना-बिलास की। [1]
चंचल है मन गस्यौ भोगन के रोगन सौं,
औषधी न लेय प्रेम-रस के सुवास की॥ [2]
आसरौ कृपा कौ एक राखौ नाथ ! मेरी टेक,
सेविका बनाऔ मोहिं केलि-कुंज खास की। [3]
आप प्रेम-सिन्धु, एक बिन्दु की भिखारिनी हौं,
अर्जी है मेरी और मर्जी हरिदास की॥ [4]

- सरसदासी लाडीवाल

हे श्री स्वामी हरिदास (ललिता सखी जू), मैं तो गँवार हूँ, प्रेम-रस के सार को नहीं जानता, मेरे तन-मन तो भोग-वासना में फँसे हुए हैं। [1]

मेरा मन तो चंचल है, संसार के भोगों के रोगों में बंधा है, प्रेम-रस की सुगंध रुपी औषधि स्वीकार नहीं करता। [2]

हे श्री हरिदासी सखी, एक आपकी कृपा का ही आसरा है, मेरी विनती सुनिए, मुझे निज-महल में जहाँ श्यामा श्याम की अनवरत केली होती है, वहीं सेविका बना लीजिये। [3]

आप तो प्रेम की सागर हो, और मैं उसके एक बूँद की भिखारिन हूँ, हे श्री हरिदासी सखी, यही मेरी आपके चरणों में अर्जी है बाकी आपकी इच्छा! [4]