जे पैसनि माँनत भलौ, तिन तैं प्रेम है दूर ।
पैसा साकत भूत के, खात परै मुँह धूर ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (355)
जो लोग धन में महत्त्व-बुद्धि रखते हैं, उनसे प्रेम बहुत दूर रहता है। पैसा पाकर तो केवल बहिर्मुख जीव ही फूला (अहंकार से भर) करता है, क्योंकि पैसे के प्राप्त होने से अनेक प्रकार की विषय-वासना स्वतः ही जीव को घेर लेती हैं।
पैसा साकत भूत के, खात परै मुँह धूर ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (355)
जो लोग धन में महत्त्व-बुद्धि रखते हैं, उनसे प्रेम बहुत दूर रहता है। पैसा पाकर तो केवल बहिर्मुख जीव ही फूला (अहंकार से भर) करता है, क्योंकि पैसे के प्राप्त होने से अनेक प्रकार की विषय-वासना स्वतः ही जीव को घेर लेती हैं।

