दुलह-दुलहिन हाथ डोरना - चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (58)

दुलह-दुलहिन हाथ डोरना - चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (58)

दुलह-दुलहिन हाथ डोरना बाँध्‍यौ राखत सजनी ।
यह दिन इनकौं प्‍यारौ लागै याही सुख की भजनी ॥ [1]
खेल खिलावै, मंगल गावैं, सुनै रससीर उपजनी ।
वृन्‍दावन हित रूप छके छवि नित सुहाग की रजनी ॥ [2]

- चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (58)

सखियाँ दुलह-दुलहिन श्री श्यामाश्याम का विवाह करने हेतु उनके कर-कमलों में कंकण बांधे रखती हैं, क्यूँकि सखियों को सब दिनों में विवाह का दिन अत्यंत प्रिय है, जिसके रस में वे नित्य डूबी रहती हैं । [1]

चाचा श्री हित वृन्दावन दास जी कहते हैं कि सखियाँ “युगल को विवाह का खेल खिलाती हैं, मंगल गीत गाती हैं और उस खेल में उत्‍पन्न होने वाली रस-संपत्ति का चयन करती हैं । नित्य सुहाग (युगल किशोर) जो एक दूसरे की रूप माधुरी से नित्य छके रहते हैं, रात्रि में रस का उपभोग कर रहे हैं । [2]