जीवन प्राण अब वन रहो - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (6)

जीवन प्राण अब वन रहो - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (6)

जीवन प्राण अब वन रहो, नवल प्रिया सुखधाम ।
व्रज वृन्दावन स्वामिनी, ललितादिक अभिराम ॥

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी, आशीस दोहा (6)

मेरा जीवन और प्राण श्री वृंदावन ही है—वह नवल-प्रिया का परम सुखधाम है, जिसकी अधिष्ठात्री स्वामिनी श्री राधा हैं और जो ललितादि सखियों को अत्यंत प्रिय एवं रमणीय है।