(राग गौरी)
कोंन तप कीनों नथ कैं मोती ।
अधर सुधा अचवत रहैं निसिदिन नैंक न परत विछोती ॥ [1]
पलपल मांहि पियाधर परसें सरसें सुख सरसोती ।
रूपरसिक अधिकहि अधिकहि अति बढत जात निति जोती ॥ [2]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (44)
श्री प्रिया जी (श्री राधा) के नथ के मोतियों ने ऐसी कौन सी तपस्या की है कि श्री राधा ने उन्हें अपने नथ का मोती बनाया है और वे नित्य ही अधर सुधा का आचमन करते हैं, और एक क्षण को भी बिछड़ते नहीं । [1]
यह मोती क्षण-क्षण में श्री प्रिया जी के अधरों का स्पर्श करता है एवं सुख-समुद्र में डूबने लगता है । श्री रूप रसिक जी कहते हैं कि "प्रत्येक क्षण इस मोती का प्रकाश अधिक से अधिक होता जा रहा है ।" [2]
कोंन तप कीनों नथ कैं मोती ।
अधर सुधा अचवत रहैं निसिदिन नैंक न परत विछोती ॥ [1]
पलपल मांहि पियाधर परसें सरसें सुख सरसोती ।
रूपरसिक अधिकहि अधिकहि अति बढत जात निति जोती ॥ [2]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (44)
श्री प्रिया जी (श्री राधा) के नथ के मोतियों ने ऐसी कौन सी तपस्या की है कि श्री राधा ने उन्हें अपने नथ का मोती बनाया है और वे नित्य ही अधर सुधा का आचमन करते हैं, और एक क्षण को भी बिछड़ते नहीं । [1]
यह मोती क्षण-क्षण में श्री प्रिया जी के अधरों का स्पर्श करता है एवं सुख-समुद्र में डूबने लगता है । श्री रूप रसिक जी कहते हैं कि "प्रत्येक क्षण इस मोती का प्रकाश अधिक से अधिक होता जा रहा है ।" [2]

