कुंज की कुटीर दोऊ आली री उमंग भरे - श्री रामसखी जी, श्री भक्तिरस मंजरी

कुंज की कुटीर दोऊ आली री उमंग भरे - श्री रामसखी जी, श्री भक्तिरस मंजरी

(कवित्त)
कुंज की कुटीर दोऊ आली री उमंग भरे,
गावत अतिरंग भरे धीरे-धीरे झूलैं॥ [1]
वृंदावन फूलि रह्यौ, अलिनी गुंजार करैं,
बोलत हैं पिकी मोर यमुना के कूलैं। [2]
अलिगन सब साज लिये, मंद मंद सुरन भरे,
निरषि निरषि युगल छवि देहदशा भूलैं॥ [3]
मनसिज मदन मित होत बरसत हैं मोद झरी,
झूलन कों जोरि सखी मेलैं भुज झूलैं। [4]
शोभा कौ उदधि आज, उमड्यौ मरजाद छाड़ि,
'रामसखी' त्रिभुवन में उपमा नहीं तूलैं॥ [5]

- श्री रामसखी जी, श्री भक्तिरस मंजरी

अरी सखी! श्री वृन्दावन के कुञ्ज कुटीर में युगल किशोर श्री श्यामा-श्याम उमंग से भरे मधुर गान कर रहे हैं, और सखियाँ उन्हें मंद गति से झूला झुला रही हैं। [1]

श्री वृन्दावन धाम आज प्रफुल्लित हो रहा है। भंवरे गुंजार कर रहे हैं, और यमुना किनारे कोयल और मोर मधुर ध्वनि में गा रहे हैं। [2]

सब सखियाँ विभिन्न साजों से सुसज्जित होकर मधुर सुर में आनंदपूर्वक गा रही हैं। वे युगल किशोर की छवि को देखकर अपनी सुध-बुध खो रही हैं। [3]

युगल जोड़ी श्री श्यामा-श्याम परस्पर गलबहियाँ डाले झूल रहे हैं, और उनकी इस छवि का अवलोकन कर कामदेव प्रचुर मात्रा में आनंद की वर्षा कर रहे हैं। [4]

आज सौंदर्य का सागर अपनी मर्यादा को छोड़ उमड़ रहा है। श्री रामसखी जी कहती हैं कि इस मनमोहक दिव्य युगल की तीनों लोकों में कोई उपमा नहीं है। [5]