पशू पखेरू होहु कछु, पाहन पानी घास ।
मांगों अँचर पसारि नित, वृन्दावन को बास ॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (24)
मैं अंचल फैलाकर यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे सदा वृंदावन-वास प्राप्त हो; चाहे उसके लिए मुझे पशु, पक्षी, पत्थर, जल या तृण का ही रूप क्यों न धारण करना पड़े।
मांगों अँचर पसारि नित, वृन्दावन को बास ॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, वृंदावन शतक प्रथम (24)
मैं अंचल फैलाकर यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे सदा वृंदावन-वास प्राप्त हो; चाहे उसके लिए मुझे पशु, पक्षी, पत्थर, जल या तृण का ही रूप क्यों न धारण करना पड़े।

