देर करो जनि नैक उबारो ।
बहिर्मुखता वश गोते खाऊँ, भवसागर में तनिक सहारो ॥ [1]
श्याम राधिका रसना गाऊँ, जासों सहजैं होय निभारो ।
'ललितविहारिणि' राखहु चरणन, दीन अनेकन तारन हारो ॥ [2]
- श्री ललित विहारिणी जी
हे श्री श्यामा श्याम, अब देर न कीजिये, मुझे उबार लीजिये । बहिर्मुख होने के कारण मैं भवसागर में गोते खा रहा हूँ, केवल आपके ही सहारे से मैं इससे निकल पाउँगा । [1]
ऐसी कृपा हो कि सदा अपनी रसना से श्याम-राधिका का ही नाम उच्चारण करता रहूँ जिससे मेरा सहज में ही कल्याण हो जाये । श्री ललितविहारिणी जी कहते हैं कि "हे श्री श्यामाश्याम, आपने अनेकों दीनों को तारा है, मुझे भी अपने चरण कमलों में स्थान प्रदान कीजिये ।" [2]
बहिर्मुखता वश गोते खाऊँ, भवसागर में तनिक सहारो ॥ [1]
श्याम राधिका रसना गाऊँ, जासों सहजैं होय निभारो ।
'ललितविहारिणि' राखहु चरणन, दीन अनेकन तारन हारो ॥ [2]
- श्री ललित विहारिणी जी
हे श्री श्यामा श्याम, अब देर न कीजिये, मुझे उबार लीजिये । बहिर्मुख होने के कारण मैं भवसागर में गोते खा रहा हूँ, केवल आपके ही सहारे से मैं इससे निकल पाउँगा । [1]
ऐसी कृपा हो कि सदा अपनी रसना से श्याम-राधिका का ही नाम उच्चारण करता रहूँ जिससे मेरा सहज में ही कल्याण हो जाये । श्री ललितविहारिणी जी कहते हैं कि "हे श्री श्यामाश्याम, आपने अनेकों दीनों को तारा है, मुझे भी अपने चरण कमलों में स्थान प्रदान कीजिये ।" [2]

