पुनि तिनकी पद-पंकज-रज अजहूँ छिछै ।
उद्धौ बुद्धि विशुद्धनु सौं पुनि सो रज इंछै ॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, श्री कृष्ण सिद्धान्त पंचाध्यायी (42)
ब्रजांगनाओं के चरण-कमलों की रज की अभिलाषा स्वयं ब्रह्मा जी भी करते हैं, और उद्धव भी अपनी विशुद्ध बुद्धि से बार-बार उसी दिव्य रज की कामना करते हैं।
उद्धौ बुद्धि विशुद्धनु सौं पुनि सो रज इंछै ॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, श्री कृष्ण सिद्धान्त पंचाध्यायी (42)
ब्रजांगनाओं के चरण-कमलों की रज की अभिलाषा स्वयं ब्रह्मा जी भी करते हैं, और उद्धव भी अपनी विशुद्ध बुद्धि से बार-बार उसी दिव्य रज की कामना करते हैं।

