(राग विहागरो)
विधाता बिधहूँ न जानी ।
सुन्दर वदन पान करवे कूँ रोम रोम प्रति
नयन न दीन्है करी यह बात अयानी ॥ [1]
श्रवण सकल वपु होत री मेरे
सुनत पिय मुख अमृत मधुर बानी ।
अरी मेरे भुजा होती कोटि कोटि तो हों भेटती
गोविन्द प्रभु सो तो हू न तपति बुझाइ सयानी ॥ [2]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (458)
ऐसा प्रतीत होता है मानो विधाता विधि से अनभिज्ञ है । श्री कृष्ण के सुन्दर वदन का पान करने के लिए उन्होंने मेरे रोम-रोम में आँखें नहीं दी, यह बात उचित नहीं है । [1]
यदि मेरे समस्त शरीर में विधाता ने कान दिए होते तो प्रियतम श्री कृष्ण के मुख से मधुर वचनामृत का पान करता । श्री गोविन्द स्वामी कहते हैं कि "यदि विधाता ने मुझे कोटि-कोटि भुजाएँ प्रदान की होती तो मैं श्री कृष्ण का आलिंगन कर अपने मन के ताप का शमन करता ।" [2]
विधाता बिधहूँ न जानी ।
सुन्दर वदन पान करवे कूँ रोम रोम प्रति
नयन न दीन्है करी यह बात अयानी ॥ [1]
श्रवण सकल वपु होत री मेरे
सुनत पिय मुख अमृत मधुर बानी ।
अरी मेरे भुजा होती कोटि कोटि तो हों भेटती
गोविन्द प्रभु सो तो हू न तपति बुझाइ सयानी ॥ [2]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (458)
ऐसा प्रतीत होता है मानो विधाता विधि से अनभिज्ञ है । श्री कृष्ण के सुन्दर वदन का पान करने के लिए उन्होंने मेरे रोम-रोम में आँखें नहीं दी, यह बात उचित नहीं है । [1]
यदि मेरे समस्त शरीर में विधाता ने कान दिए होते तो प्रियतम श्री कृष्ण के मुख से मधुर वचनामृत का पान करता । श्री गोविन्द स्वामी कहते हैं कि "यदि विधाता ने मुझे कोटि-कोटि भुजाएँ प्रदान की होती तो मैं श्री कृष्ण का आलिंगन कर अपने मन के ताप का शमन करता ।" [2]

