धन्य धन्य वृंदावन बासी विलाव चूहे जो,
मंदिरों में घुस प्रभु का प्रसाद पाते हैं। [1]
धन्य धन्य वृंदावन वासी कीट पतंग जो,
पादोदक पान कर लोटते नहाते हैं॥ [2]
धन्य धन्य वृन्दावन बासी मशक वृन्द जो,
साधुओं को जगाके भजन करवाते हैं। [3]
धन्य धन्य वृन्दावन वासी मोर मर्कट जो,
नाच नाच नृत्य सुध श्याम की दिलाते हैं॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (27)
धन्य धन्य हैं वृंदावन के चूहे जो वृंदावन के मंदिरों के भीतर घुसकर प्रभु का प्रसाद प्राप्त करते है। [1]
धन्य धन्य हैं वृंदावन के कीट-पतंग क्योंकि वे उस जल को पीते हैं और उसमें स्नान करते हैं जो प्रभु के चरणों को धोता है। [2]
धन्य धन्य हैं वृन्दावन के मच्छर जो सोए हुए भक्तों को जगाकर उन्हें श्री राधा कृष्ण की भक्ति करवाते हैं। [3]
श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि धन्य धन्य हैं वृंदावन के मोर एवं बंदर जो नृत्य कर, नाच-नाच कर जीवों को श्यामसुंदर की याद दिलाते हैं। [4]
मंदिरों में घुस प्रभु का प्रसाद पाते हैं। [1]
धन्य धन्य वृंदावन वासी कीट पतंग जो,
पादोदक पान कर लोटते नहाते हैं॥ [2]
धन्य धन्य वृन्दावन बासी मशक वृन्द जो,
साधुओं को जगाके भजन करवाते हैं। [3]
धन्य धन्य वृन्दावन वासी मोर मर्कट जो,
नाच नाच नृत्य सुध श्याम की दिलाते हैं॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (27)
धन्य धन्य हैं वृंदावन के चूहे जो वृंदावन के मंदिरों के भीतर घुसकर प्रभु का प्रसाद प्राप्त करते है। [1]
धन्य धन्य हैं वृंदावन के कीट-पतंग क्योंकि वे उस जल को पीते हैं और उसमें स्नान करते हैं जो प्रभु के चरणों को धोता है। [2]
धन्य धन्य हैं वृन्दावन के मच्छर जो सोए हुए भक्तों को जगाकर उन्हें श्री राधा कृष्ण की भक्ति करवाते हैं। [3]
श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि धन्य धन्य हैं वृंदावन के मोर एवं बंदर जो नृत्य कर, नाच-नाच कर जीवों को श्यामसुंदर की याद दिलाते हैं। [4]

