भतरौंड़ ग्राम में श्री कृष्ण ने यज्ञ पत्नियों के द्वारा लाये हुए नाना प्रकारके सुस्वादु अन्न- व्यञ्जनों का आस्वादन किया था ।
एक समय गोप सखाओंके साथ श्रीकृष्ण कहीं पास ही गोचारण कर रहे थे । भूख लगने पर कृष्ण ने सखाओं को यहीं यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणों के पास भोज्य- द्रव्य माँगने के लिए भेजा, किन्तु यज्ञ करने में संलग्न भक्ति-रहित उन ब्राह्मणों ने उन्हें भोज्य पदार्थ नहीं दिये । सखा लोग तिरस्कृत होकर कृष्णके पास लौट आये । श्री कृष्ण ने उन्हें समझा-बुझाकर पुनः ब्राह्मणों की पत्नियों के पास कुछ माँगने के लिए भेजा ।
कृष्ण के समझाने-बुझाने से सखा लोग यज्ञपत्नियों के निवास स्थानपर गये और कृष्ण बलराम के लिए कुछ अन्न माँगा । बलराम और कृष्ण का नाम सुनते ही यज्ञ पत्नियाँ भावविह्वल हो गईं । वे थालों में नाना प्रकार के सुस्वादु अन्न- व्यञ्जन लेकर कृष्ण के दर्शनों के लिए बड़ी उत्कण्ठित होकर चल पड़ीं । अपने पतियों के द्वारा बाधा दिये जानेपर भी वे रुकी नहीं । कुछ याज्ञिक विप्रोंने अपनी पत्नियोंको घरों में बलपूर्वक बंद कर दिया । किन्तु वे भी विरहताप से अपने शरीर को छोड़कर श्री कृष्ण से जा मिलीं ।
जब ब्राह्मणियाँ श्री कृष्ण के निकट पहुँचीं, तब उनका नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण रूप देखकर मुग्ध हो गई । उनके श्याम अङ्गोंपर पीताम्बर स्थिर विद्युत्की भाँति फहरा रहा था ।
श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्हधातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे ।
विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम् ॥
- श्रीमद्भागवतम् (10.23.22)
“श्री कृष्ण का रंग श्यामल था और वस्त्र सुनहले थे । वे मोरपंख, रंगीन आकृतियां, फूल की कलियों का गुच्छा तथा वन के फूलों और पत्तियों की वनमाला धारण किये हुए नाटक के नर्तक की भाँति वेश बनाये थे । वे अपना एक हाथ अपने मित्र के कंधे पर रखे थे और दूसरे से कमल का फूल घुमा रहे थे । उनके कानों में कुमुदिनियाँ सुशोभित थीं, उनके केश गालों पर लटक रहे थे और उनका कमल सदृश मुख हँसी से युक्त था ।”
ब्राह्मण पत्नियाँ कृष्ण का दर्शन कर प्रेम में इस प्रकार आविष्ट हो गई कि अपने पतियों के पास वापस घर लौटना नहीं चाहतीं थीं । किन्तु कृष्ण के द्वारा समझाये जानेपर किसी प्रकार घर लौटने के लिए तैयार हुई ।
यज्ञ पत्नियों के घर लौटनेपर उनके पतियों के भाव सम्पूर्ण रूप से बदल गये । वे अपने तीन प्रकार के जन्म, विद्या और वैदिक क्रियाओं में अपनी दक्षता आदिको धिक्कार देते हुए अपनी पत्नियों की अलौकिक कृष्ण भक्ति की प्रशंसा करने लगे ।
वर्त्तमान में यहाँ श्री भतरौंड़ बिहारी जी का मंदिर है ।
स्थान :
श्री भतरौंड़ बिहारी जी का मंदिर वृन्दावन के राजपुर वाँगर (अशोक वन) के भतरौंड़ ग्राम में स्थित है जो अक्रूर घाट के पास है ।

