सब तें न्यारे सबके प्यारे ऐसी रहनी रहिये ।
निंदा अस्तुति छोड़ि पराई जुगल जीभ जस कहिये ॥ [1]
दुख सुख हानि लाभ सम बरतै आनि परै सो सहिये ।
भगवतरसिक सरन गहि बल्लभ सर्वोपरि सुख लहिये ॥ [2]
- श्री विहारीवल्लभ, श्री विहारीवल्लभ जी की वाणी
सबसे उदासीन रहें एवं सबका आदर करें जिससे सब आपसे प्रेम करें, ऐसी रहनी से रहिये । अपनी जीभ से दूसरों की निंदा एवं स्तुति न करिए, एवं उसको निरंतर श्री राधा कृष्ण के नाम का उच्चारण करने में लगाइए । [1]
दुःख सुख एवं हानि-लाभ को समान माने, और इनके आने पर सहनशील रहिये । श्री भगवतरसिक जी कहते हैं कि "श्री राधा कृष्ण की शरण ग्रहण करो जिससे सर्वोपरि सुख की प्राप्ति होगी ।" [2]
निंदा अस्तुति छोड़ि पराई जुगल जीभ जस कहिये ॥ [1]
दुख सुख हानि लाभ सम बरतै आनि परै सो सहिये ।
भगवतरसिक सरन गहि बल्लभ सर्वोपरि सुख लहिये ॥ [2]
- श्री विहारीवल्लभ, श्री विहारीवल्लभ जी की वाणी
सबसे उदासीन रहें एवं सबका आदर करें जिससे सब आपसे प्रेम करें, ऐसी रहनी से रहिये । अपनी जीभ से दूसरों की निंदा एवं स्तुति न करिए, एवं उसको निरंतर श्री राधा कृष्ण के नाम का उच्चारण करने में लगाइए । [1]
दुःख सुख एवं हानि-लाभ को समान माने, और इनके आने पर सहनशील रहिये । श्री भगवतरसिक जी कहते हैं कि "श्री राधा कृष्ण की शरण ग्रहण करो जिससे सर्वोपरि सुख की प्राप्ति होगी ।" [2]

