मना ! वृषभानुनन्दिनी जाँचि ।
जा राधा-मुरलीधर ध्यावत, ताहि गाइ नित नाँचि ॥ [1]
जाकी शक्ति जोगमाया बल, रस कौं रसिक कहावै ।
सो वृन्दावननाथ प्रेम बस, अपने अंग नचावै ॥ [2]
आनन्दित निजु शक्ति शिरोमनि, नख-शिख श्याम अचेत ।
ताकी कृपा-कटाक्ष बिना हरि, काहू कछू न देत ॥ [3]
परम कृपालु दयालु दुखीजन, कामधेनु सुखरासि ।
श्रीबरसाने खेत कलपतरु, दै दिन 'बीठल' वासि ॥ [4]
- श्री हित विट्ठल जू
हे मन, तू वृषभानु नन्दिनी श्री राधा से याचना कर । जिन श्री राधा की आराधना मुरलीधर श्री कृष्ण करते हैं, उनके नाम का नित्य गान करते हुए नृत्य कर । [1]
जो अपनी योगमाया शक्ति के बल से रस के रसिक कहाते हैं, उन वृन्दावननाथ श्री कृष्ण को श्री राधा प्रेम के वश से नृत्य कराती हैं । [2]
जिन आनन्दिनी शक्ति शिरोमणि के नख-शिख दर्शन से श्री श्यामसुंदर अचेत हो जाते हैं, उन श्री राधा के कृपा-कटाक्ष के बिना श्री हरि किसी को कुछ देते नहीं । [3]
श्री हित विट्ठल जी कहते हैं कि "हे परम कृपालु, दुखियों पर दया करनेवाली, हे कामधेनु सुखरासी श्री राधा, मुझे कल्पतरु स्वरुप श्री बरसाने का वास प्रदान कीजिये ।" [4]
जा राधा-मुरलीधर ध्यावत, ताहि गाइ नित नाँचि ॥ [1]
जाकी शक्ति जोगमाया बल, रस कौं रसिक कहावै ।
सो वृन्दावननाथ प्रेम बस, अपने अंग नचावै ॥ [2]
आनन्दित निजु शक्ति शिरोमनि, नख-शिख श्याम अचेत ।
ताकी कृपा-कटाक्ष बिना हरि, काहू कछू न देत ॥ [3]
परम कृपालु दयालु दुखीजन, कामधेनु सुखरासि ।
श्रीबरसाने खेत कलपतरु, दै दिन 'बीठल' वासि ॥ [4]
- श्री हित विट्ठल जू
हे मन, तू वृषभानु नन्दिनी श्री राधा से याचना कर । जिन श्री राधा की आराधना मुरलीधर श्री कृष्ण करते हैं, उनके नाम का नित्य गान करते हुए नृत्य कर । [1]
जो अपनी योगमाया शक्ति के बल से रस के रसिक कहाते हैं, उन वृन्दावननाथ श्री कृष्ण को श्री राधा प्रेम के वश से नृत्य कराती हैं । [2]
जिन आनन्दिनी शक्ति शिरोमणि के नख-शिख दर्शन से श्री श्यामसुंदर अचेत हो जाते हैं, उन श्री राधा के कृपा-कटाक्ष के बिना श्री हरि किसी को कुछ देते नहीं । [3]
श्री हित विट्ठल जी कहते हैं कि "हे परम कृपालु, दुखियों पर दया करनेवाली, हे कामधेनु सुखरासी श्री राधा, मुझे कल्पतरु स्वरुप श्री बरसाने का वास प्रदान कीजिये ।" [4]

