श्री राधा सुख चंद देखि  - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (122)

श्री राधा सुख चंद देखि - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (122)

(राग विभास)
श्री राधा-सुख-चंद देखि कोटि चंद वारौं । [1]
दसनन पर दामिनि नासा पर कीर,
भौंह धनुष नैन निरखि त्रिबिधि ताप जारों ॥ [2]
अंग अंग छबि-तरंग रूप की उजारी,
बिधिना यह रुचिर रुची त्रिभुवन महि नारी । [3]
भूषण नव जगमगात नीलांबर सारी,
‘'ब्रजनिधि’ पिय बस किए गोबिंद पिय प्यारी ॥ [4]

- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि पद संग्रह (122)

श्री राधा के मुख चन्द्र को देख कर कोटि चन्द्रमा को न्यौछवार कर दो । [1]

उनकी दन्त पंक्तियों पर दामिनी, नासिका पर शुक (तोता), भौंह पर धनुष को न्यौछवार कर दो, और श्री राधा के नैनों को निहार कर अपने तीन प्रकार के तापों (दैहिक, दैविक एवं भौतिक ताप) को जला डालो । [2]

उनके प्रत्येक अंग से छवि की तरंगें हिलोरें लेती रहती हैं और उनका रूप परम उज्जवल है । विधाता ने ऐसी सुंदरता त्रिभुवन में अन्य किसी स्त्री को नहीं दी । [3]

उनके आभूषण नित्य नवायमान होकर जगमगाते रहते हैं एवं तन पर सुंदर नीलांबर साड़ी धारण करी है । श्री ब्रजनिधि जी कहते हैं कि गोविंद (श्री कृष्ण) नित्य ही श्री राधा के वशीभूत होकर रहते हैं । [4]