नव रस सब नीरस लगे - श्री माधुरीदास, मान माधुरी (39)

नव रस सब नीरस लगे - श्री माधुरीदास, मान माधुरी (39)

नव रस सब नीरस लगे, सब रस को सिर मौर ।
मान माधुरी रस बिना, मन न रसै रस और ॥

- श्री माधुरीदास, मान माधुरी (39)

समस्त नवीन रस भी मान-माधुरी रूपी सर्वोपरि रस के बिना फीके प्रतीत होते हैं। एक बार इस परम माधुर्य-रस की प्राप्ति हो जाए, तो मन फिर किसी अन्य रस में नहीं रमता।