जाकौ मुख देखने कूँ त्यागि सर्व लोक सुख - ब्रज के कवित्त

जाकौ मुख देखने कूँ त्यागि सर्व लोक सुख - ब्रज के कवित्त

(कवित्त)
जाकौ मुख देखने कूँ त्यागि सर्व लोक सुख,
नीलकण्ठ बौरौ-सौ फिरत विष खाय कैं। [1]
घोर तप साधै तजि लौकिक उपाधैं सब,
सिद्ध-मुनि-जोगी नाग ध्यावैं सिर नाय कैं॥ [2]
पूतना-सकट बक धैनुक से दैत्य हने,
कालिन्दी कौ कष्ट मेट्यौ काली नाग लाय कैं। [3]
दावानल पान कियौ अंगुरी पे गिरि धार्यौ,
थाकै चारौ वेद सेष हारे जस गाय कैं॥ [4]

- ब्रज के कवित्त

जिनका मुख दर्शन करने के लिए नीलकंठ (भगवान शंकर) समस्त लोकों का सुख त्याग कर ब्रज में बौराए से घूम रहे हैं। [1]

जिनका ध्यान करने के लिए सिद्ध, मुनि, योगी, शेष नाग आदि समस्त उपाधियाँ त्याग कर, घोर तपस्या कर रहे हैं। [2]

जिन्होनें पूतना, बकासुर, धेनुकासुर आदि दैत्यों का विनाश किया, और कालिन्दी (यमुना) को कालिया नाग के प्रकोप से निवारण किया। [3]

जिन्होनें ब्रज में दावानल का पान किया एवं अपनी उँगली पर गिरिराज जी को धारण किया, ऐसे श्री कृष्ण की महिमा का गान कर चारों वेद भी थकित हो रहे हैं एवं शेष नाग भी हार रहा है। [4]