चाँपत लालन पाँय प्रिया के ।
कोमल कल कंजन हूँ ते अति, छुवत हरे हरे करज भिया के ॥ [1]
नैन लगाय भाल भल पाये, जे दोऊ मेरे जीव जिया के ।
‘वल्लभ जुगल’ सम्हारत पुनि पुनि, रंग मनौं धन धाम धिया के ॥ [2]
- श्री वल्लभ जुगल जी
श्री प्यारी जू (श्री राधा) के चरण कमलों को श्री लाल जी (श्री कृष्ण) दबा रहे हैं । श्री राधा के चरण कमल के फूल से भी अधिक कोमल हैं जिनको बहुत ही धीरे धीरे श्री श्यामसुन्दर छूते हैं, इस भय से की उन्हें कहीं तनिक भी कष्ट ना हो । [1]
श्री प्यारी जू के चरणों को लालजी अपने नैनों से लगाते हैं, अपने माथे को छुवा कर अपना सौभाग्य मानते हैं एवं श्री राधा के युगल चरणों को ही अपने ह्रदय का सर्वस्व प्राण धन मानते हैं । श्री वल्लभ जुगल जी कहते हैं कि इस प्रकार श्री लालजी पुनि पुनि श्री राधा के चरणों की विभिन्न प्रकार से संवार कर उनकी सेवा करते हैं । [2]
कोमल कल कंजन हूँ ते अति, छुवत हरे हरे करज भिया के ॥ [1]
नैन लगाय भाल भल पाये, जे दोऊ मेरे जीव जिया के ।
‘वल्लभ जुगल’ सम्हारत पुनि पुनि, रंग मनौं धन धाम धिया के ॥ [2]
- श्री वल्लभ जुगल जी
श्री प्यारी जू (श्री राधा) के चरण कमलों को श्री लाल जी (श्री कृष्ण) दबा रहे हैं । श्री राधा के चरण कमल के फूल से भी अधिक कोमल हैं जिनको बहुत ही धीरे धीरे श्री श्यामसुन्दर छूते हैं, इस भय से की उन्हें कहीं तनिक भी कष्ट ना हो । [1]
श्री प्यारी जू के चरणों को लालजी अपने नैनों से लगाते हैं, अपने माथे को छुवा कर अपना सौभाग्य मानते हैं एवं श्री राधा के युगल चरणों को ही अपने ह्रदय का सर्वस्व प्राण धन मानते हैं । श्री वल्लभ जुगल जी कहते हैं कि इस प्रकार श्री लालजी पुनि पुनि श्री राधा के चरणों की विभिन्न प्रकार से संवार कर उनकी सेवा करते हैं । [2]

