रूप के जाल परयौ मन मेरौ ।
जोवन रस पीवत न अघातौ, मुसिकनि हूँ अरुझेरौ ॥ [1]
कुंजमहल रतिपति दल छायौ, विवस भयौ बिबि नेरौ ।
श्रीललितमोहिनी सब सुख दीनौं, दुहुँनि नेह घनेरौ ॥ [2]
- श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, शृंगार रस के पद (44)
श्री ललित मोहिनी जी कहती है कि मेरा मन श्री श्यामा कुंज बिहारी के सौंदर्य जाल में ऐसा फंस गया है कि निरंतर उन दोनों की मुस्कानों में उलझा रहता है जो यौवन रस (नित्य बिहार का सुख) का सतत पान करते हुए भी सदा अतृप्त बना रहता है । [1]
उस कुंज महल में जहां कामदेवों का दल (कोटि अभिलाषाओं का विलास) छाया हुआ है वहीं उन दोनों के पास यह मेरा मन भी रस विवश हो रहा है । इन दोनों के सघन प्रेम रस ने मुझे सब सुख प्रदान कर दिया है । [2]
जोवन रस पीवत न अघातौ, मुसिकनि हूँ अरुझेरौ ॥ [1]
कुंजमहल रतिपति दल छायौ, विवस भयौ बिबि नेरौ ।
श्रीललितमोहिनी सब सुख दीनौं, दुहुँनि नेह घनेरौ ॥ [2]
- श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, शृंगार रस के पद (44)
श्री ललित मोहिनी जी कहती है कि मेरा मन श्री श्यामा कुंज बिहारी के सौंदर्य जाल में ऐसा फंस गया है कि निरंतर उन दोनों की मुस्कानों में उलझा रहता है जो यौवन रस (नित्य बिहार का सुख) का सतत पान करते हुए भी सदा अतृप्त बना रहता है । [1]
उस कुंज महल में जहां कामदेवों का दल (कोटि अभिलाषाओं का विलास) छाया हुआ है वहीं उन दोनों के पास यह मेरा मन भी रस विवश हो रहा है । इन दोनों के सघन प्रेम रस ने मुझे सब सुख प्रदान कर दिया है । [2]

