(राग सारंग)
नैननि देख्यौ, सोई भावै ।
जोई कपट लोभ तजिकै (श्री) राधावल्लभकै गुन गावै ॥ [1]
रसिक अनन्य भक्ति मंडलकी मीठी बात सुनावै ।
ताके चरन शरन ह्वै रहिये, दिन प्रति रास दिखावै ॥ [2]
स्यामास्याम करैं सोई जो, व्यासदास सुख पावै ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (232)
मेरे नैनों को वही भाता है जो कपट एवं लोभ का त्याग कर श्री राधा वल्लभ का गुणगान करता है । [1]
जो रसिक अनन्यों की मंडली से हो और नित्य प्रति प्रिया प्रियतम की मीठी बात सुनाता हो, उसकी नित्य चरण शरण में रहना चाहिए क्योंकि ऐसे अनन्य रसिक नित्य प्रति रास का दर्शन करवाते हैं । [2]
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्री श्यामा श्याम वही करते हैं जिससे मुझे सुख मिलता है । [3]
नैननि देख्यौ, सोई भावै ।
जोई कपट लोभ तजिकै (श्री) राधावल्लभकै गुन गावै ॥ [1]
रसिक अनन्य भक्ति मंडलकी मीठी बात सुनावै ।
ताके चरन शरन ह्वै रहिये, दिन प्रति रास दिखावै ॥ [2]
स्यामास्याम करैं सोई जो, व्यासदास सुख पावै ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (232)
मेरे नैनों को वही भाता है जो कपट एवं लोभ का त्याग कर श्री राधा वल्लभ का गुणगान करता है । [1]
जो रसिक अनन्यों की मंडली से हो और नित्य प्रति प्रिया प्रियतम की मीठी बात सुनाता हो, उसकी नित्य चरण शरण में रहना चाहिए क्योंकि ऐसे अनन्य रसिक नित्य प्रति रास का दर्शन करवाते हैं । [2]
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्री श्यामा श्याम वही करते हैं जिससे मुझे सुख मिलता है । [3]

