कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.3)

कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.3)

ज्यौं रविकर रवि सौं सदा, विलग न कबहुँ होयँ ।
त्यौं श्री हरि अरु राधिका, छिनु न्यारे नहिं होयँ ॥

- श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.3)

जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से कभी पृथक नहीं होतीं, वैसे ही श्रीहरि और श्री राधिका एक क्षण के लिए भी अलग नहीं होते—दोनों सदा अभिन्न हैं।