(राग ध्रुपद)
ऐसो आनन्द सखी आज लों न देखो कबूँ,
आप ही झूलनिहार आप ही झुलावें। [1]
वरषत घन गरजि घोर बोलत पिक नचत मोर,
चपला चमकि चहूँ ओर दम्पति हरषावें॥ [2]
भीजि रहे चीर बहे कुसुम रंग अंग अंग,
तापै दोउ एक संग मिलि मलार गावें। [3]
नारायण पीय प्यारी सावन सुख लेत सखी,
गौर श्याम बदन रती मदन को लजावें॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (16)
(सखी वचन)
हे सखी, आज दिव्य दंपति ने जैसा रस बरसाया है वैसा कभी भी देखा नहीं। वे स्वयं ही झूल रहे हैं एवं स्वयं ही झूला झुला रहे हैं। [1]
बादलों की गड़गड़ाहट हो रही है, कोयल मधुर गान कर रही है, मोर नृत्य कर रहे हैं, चारों ओर बिजली चमक रही है, जिसे देखकर श्री श्यामा श्याम हर्षित हो रहे हैं। [2]
उनके वस्त्र वर्षा से भीग रहे हैं और अंगों पर कुसुमी रंग चढ़ गया है। इतना ही नहीं वे दोनों अब एक संग मिलकर राग मलार गा रहे हैं। [3]
श्री नारायण स्वामी कहते हैं, “अरी सखी! प्रीतम प्यारी (दिव्य युगल) आज सावन सुख ले रहे हैं जिनकी गौर श्यामल दिव्य रति को देखकर कामदेव भी लज्जित हो रहा है।” [4]

