किशोरी राखो शरण गहे की लाज - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (120)

किशोरी राखो शरण गहे की लाज - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (120)

(राग दरबारी कान्हरा)
किशोरी राखो शरण गहे की लाज ।
मन नहीं लागत दरश बिन प्यारी,
रसिकन की सिरताज ॥ [1]
नेक नज़र भर देखो मो दिशि,
जावे सब दुख भाज ।
रूप माधुरी सरस स्वामिनी,
अरज सुनो यह आज ॥ [2]

- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (120)

हे किशोरी जी! तुम्हारी शरण में आए हुए इस जीव की लाज अब तुम्हारे ही हाथ है। हे रसिकन की सिरताज! अब आपके दर्शन के बिना मेरा मन कहीं नहीं लगता । [1]

अब मेरी ओर नेक (थोड़ी से) कृपा की नजर भर कर देख लो जिससे मेरे समस्त दुखों का अंत हो जाए। श्री रूप माधुरी जी कहते हैं, हे सरस स्वामिनी, आज यह मेरी अरज सुन भी लो ! [2]