(राग विहाग)
मोहि भरोसौ श्री गिरिराज कौ ।
कहा जु भयौ तन मन धन जोरैं, भक्ति बिना कहा काज कौ ॥ [1]
ऊंची मेंड़ी कौन काज की, ब्रज बसिवौ भलौ छाज कौ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, वल्लभ कुल सिरताज कौ ॥ [2]
- श्री छीत स्वामी
मुझे तो केवल श्री गिरिराज जी पर ही भरोसा है । भक्ति विहीन होकर यदि तन, मन, लगाकर कितना भी धन जोड़ा जाए अथवा कोई भी कार्य किया हो, अंततः वह किसी काम का नहीं रह जाता । [1]
ऊँची मेंड़ (बड़े बड़ी इमारतें एवं घर) किसी काम की नहीं, ब्रज में झोंपड़ी (कुटिया) बनाकर वास करना भला है । श्री छीत स्वामी कहते हैं कि श्री विट्ठल नाथ वल्लभ कुल के सिरताज हैं । [2]
मोहि भरोसौ श्री गिरिराज कौ ।
कहा जु भयौ तन मन धन जोरैं, भक्ति बिना कहा काज कौ ॥ [1]
ऊंची मेंड़ी कौन काज की, ब्रज बसिवौ भलौ छाज कौ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, वल्लभ कुल सिरताज कौ ॥ [2]
- श्री छीत स्वामी
मुझे तो केवल श्री गिरिराज जी पर ही भरोसा है । भक्ति विहीन होकर यदि तन, मन, लगाकर कितना भी धन जोड़ा जाए अथवा कोई भी कार्य किया हो, अंततः वह किसी काम का नहीं रह जाता । [1]
ऊँची मेंड़ (बड़े बड़ी इमारतें एवं घर) किसी काम की नहीं, ब्रज में झोंपड़ी (कुटिया) बनाकर वास करना भला है । श्री छीत स्वामी कहते हैं कि श्री विट्ठल नाथ वल्लभ कुल के सिरताज हैं । [2]

