रट मन राधिका दिन रैन ।
जोग जग्य अचार जप तप जासु समतुल है न ॥ [1]
जपत नित नव मुरलिका में स्याम घन सुख दैन ।
ध्यान हिय धारत निरंतर, लहत तब हीं चैन ॥ [2]
भुक्ति मुक्ति परात्पर जो, कुंज मंजुल ऐन ।
'सरस' रस की माधुरी तहँ नित्य निरखै नैन ॥ [3]
- श्री सरस माधुरी
हे मन, श्री राधा का नाम का नित्य गुणगान कर जिसकी समानता योग, यज्ञ, आचार, जप, तप आदि नहीं कर सकते । [1]
सबको सुख देने वाले श्यामसुन्दर नित्य ही अपनी मुरली में श्री राधा नाम जपते हैं । ह्रदय में तभी आनंद का अनुभव करते हैं जब वे श्री राधा का निरंतर ध्यान करते हैं । [2]
भुक्ति और मुक्ति से भी परे का सुख कुंज महल में बरसता है जहां सरस माधुरी जी प्रिया प्रियतम के दिव्य रस लीला का अवलोकन करते रहते हैं । [3]
जोग जग्य अचार जप तप जासु समतुल है न ॥ [1]
जपत नित नव मुरलिका में स्याम घन सुख दैन ।
ध्यान हिय धारत निरंतर, लहत तब हीं चैन ॥ [2]
भुक्ति मुक्ति परात्पर जो, कुंज मंजुल ऐन ।
'सरस' रस की माधुरी तहँ नित्य निरखै नैन ॥ [3]
- श्री सरस माधुरी
हे मन, श्री राधा का नाम का नित्य गुणगान कर जिसकी समानता योग, यज्ञ, आचार, जप, तप आदि नहीं कर सकते । [1]
सबको सुख देने वाले श्यामसुन्दर नित्य ही अपनी मुरली में श्री राधा नाम जपते हैं । ह्रदय में तभी आनंद का अनुभव करते हैं जब वे श्री राधा का निरंतर ध्यान करते हैं । [2]
भुक्ति और मुक्ति से भी परे का सुख कुंज महल में बरसता है जहां सरस माधुरी जी प्रिया प्रियतम के दिव्य रस लीला का अवलोकन करते रहते हैं । [3]

