(राग विभास व कान्हरौं )
प्यारी जू हम तुम दोऊ
एक कुंज के सखा रूसैं क्यौं बनैं ।
इहाँ न कोउ हितू मेरौ न तेरौ जो यह पीर जनैं ॥ [1]
हौं तेरी बसीठ तू मेरौ और न बीच सनैं ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी कहत प्रीति पनैं ॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (79)
(श्री कृष्ण निभृत निकुंज में श्री राधा से कहते हैं):
हे प्यारी जू, हम दोनों एक ही कुंज के साथी हैं, तो हम क्यों एक दूसरे से रूठें । यहां कोई हमारा ऐसा हितैषी नहीं जो हम दोनों की पीर को समझ सके । [1]
यहाँ मैं ही तुम्हारा सन्देशवाहक हूँ, और तुम मेरी । अन्य कोई हमारे बीच यहाँ नहीं आ सकता । श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी प्रेमपन से निहित बातचीत कर रहे हैं । [2]
प्यारी जू हम तुम दोऊ
एक कुंज के सखा रूसैं क्यौं बनैं ।
इहाँ न कोउ हितू मेरौ न तेरौ जो यह पीर जनैं ॥ [1]
हौं तेरी बसीठ तू मेरौ और न बीच सनैं ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी कहत प्रीति पनैं ॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (79)
(श्री कृष्ण निभृत निकुंज में श्री राधा से कहते हैं):
हे प्यारी जू, हम दोनों एक ही कुंज के साथी हैं, तो हम क्यों एक दूसरे से रूठें । यहां कोई हमारा ऐसा हितैषी नहीं जो हम दोनों की पीर को समझ सके । [1]
यहाँ मैं ही तुम्हारा सन्देशवाहक हूँ, और तुम मेरी । अन्य कोई हमारे बीच यहाँ नहीं आ सकता । श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी प्रेमपन से निहित बातचीत कर रहे हैं । [2]

