ऐसौ प्रेम न कहूँ ‘ध्रुव’, है वृंदावन माहिं ।
तिन बिच अंतर निमिष कौ, होत जु कबहूँ नाहिं ॥
- श्री ध्रुवदास, प्रीति चौवनी (21)
ऐसा अद्भुत प्रेम-रस केवल वृन्दावन के नित्य-विहार में ही है, अन्यत्र कहीं नहीं; जहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य संयोग में होते हुए भी (अर्थात् निमिष-काल का भी वियोग न होते हुए) उनमें अतृप्ति-रूपी उत्कंठा, अर्थात् विरह, सदा बना रहता है।
तिन बिच अंतर निमिष कौ, होत जु कबहूँ नाहिं ॥
- श्री ध्रुवदास, प्रीति चौवनी (21)
ऐसा अद्भुत प्रेम-रस केवल वृन्दावन के नित्य-विहार में ही है, अन्यत्र कहीं नहीं; जहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य संयोग में होते हुए भी (अर्थात् निमिष-काल का भी वियोग न होते हुए) उनमें अतृप्ति-रूपी उत्कंठा, अर्थात् विरह, सदा बना रहता है।

