(राग विभास)
आवति कुंजन तें गरबहियाँ ।
मदमाते अरसाते दम्पत्ति,
डगमग अवनि धरत हैं पैंयाँ ॥ [1]
छोर रहे छुटि नील पीत पट,
जात सम्हारत सखि दोउ घैंयाँ । [2]
डर-डर जात समात मुदित मन,
अलबेलीअलि भुज गहि गहियाँ ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (83)
दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण कुंजों से गरबाहीं डाल कर, रस में छके, आलस्य से भर कर डगमगाते हुए चरणों से आ रहे हैं । [1]
श्री राधा कृष्ण के नीले और पीले वस्त्रों के छोर छूट रहे हैं जिनको सखियाँ सम्भाल रही हैं । [2]
सखियाँ अपने प्रफुल्लित मन से डरते डरते दिव्य दंपति को अपनी भुजाओं में थाम कर चल रही हैं । [3]
आवति कुंजन तें गरबहियाँ ।
मदमाते अरसाते दम्पत्ति,
डगमग अवनि धरत हैं पैंयाँ ॥ [1]
छोर रहे छुटि नील पीत पट,
जात सम्हारत सखि दोउ घैंयाँ । [2]
डर-डर जात समात मुदित मन,
अलबेलीअलि भुज गहि गहियाँ ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (83)
दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण कुंजों से गरबाहीं डाल कर, रस में छके, आलस्य से भर कर डगमगाते हुए चरणों से आ रहे हैं । [1]
श्री राधा कृष्ण के नीले और पीले वस्त्रों के छोर छूट रहे हैं जिनको सखियाँ सम्भाल रही हैं । [2]
सखियाँ अपने प्रफुल्लित मन से डरते डरते दिव्य दंपति को अपनी भुजाओं में थाम कर चल रही हैं । [3]

