त्वद्वार्तोत्तर गीतगुम्फितमुखो वेणु: समन्तादभूत्वद्वेशोचित शिल्पकल्पनमयी सर्वा बभूव क्रिया ।
त्वन्नामानि बभूवुरस्य सुरभीवृन्दानि वृन्दाटवी राधे त्वन्मयवल्लिमण्डलघना जाताद्य कंसद्विष:॥
- श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (3.8)
ललिता - हे राधे! श्रीकृष्ण की वंशी सदा तुम्हारे ही चरित्र का गान करती रहती है, वे तुम्हारी वेश-रचना के योग्य ही समस्त शिल्प क्रिया करते रहते हैं, समस्त गौएँ तुम्हारे नाम की हो रही हैं अर्थात् गौओं को बुलाते समय वे राधे-राधे ही उच्चारण करते हैं। हे सुंदरि! श्रीकृष्ण के लिए लता समूह मण्डल यह श्रीवृन्दावन इस समय राधामय ही हो रहा है - सर्वत्र उन्हें तुम्हारा ही स्वरूप स्फुरित होता है ।
त्वन्नामानि बभूवुरस्य सुरभीवृन्दानि वृन्दाटवी राधे त्वन्मयवल्लिमण्डलघना जाताद्य कंसद्विष:॥
- श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (3.8)
ललिता - हे राधे! श्रीकृष्ण की वंशी सदा तुम्हारे ही चरित्र का गान करती रहती है, वे तुम्हारी वेश-रचना के योग्य ही समस्त शिल्प क्रिया करते रहते हैं, समस्त गौएँ तुम्हारे नाम की हो रही हैं अर्थात् गौओं को बुलाते समय वे राधे-राधे ही उच्चारण करते हैं। हे सुंदरि! श्रीकृष्ण के लिए लता समूह मण्डल यह श्रीवृन्दावन इस समय राधामय ही हो रहा है - सर्वत्र उन्हें तुम्हारा ही स्वरूप स्फुरित होता है ।

