मनुआं मत कर निमक हरामी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (157)

मनुआं मत कर निमक हरामी - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (157)

(जोगिया कलंगड़ा)
मनुआं मत कर निमक हरामी ।
सेय निकुंजद्वार निशिवासर आलस तजि खल कामी ॥ [1]
विगरी वेग समार रसिक हो सतगुर करस गुलामी।
बहुत दिना लौं ललितकिशोरी पतितन में रहो नामी ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (157)

अरे मन, नमक हरामी मत कर । अरे दुष्ट, समस्त प्रकार का आलस त्याग कर प्रिया प्रियतम के निकुंज द्वार की ही नित्य सेवा कर । [1]

तू तो बहुत दिनों से पतितों का सिरमौर रहा है, अब तू रसिक महापुरुषों की आज्ञा का पालन कर जल्दी से जल्दी अपनी बिगड़ी क्यों नहीं बना लेता । [2]