(राग आसावरी)
प्रीति तो नंदनंदन सों कीजै ।
संपति विपति परे प्रतिपाले, कृपा करें तो जीजे ॥ [1]
परम उदार चतुर चिंतामणि, सेवा सुमिरन मानें ।
हस्त कमल की छाया राखत, अंतरगति की जानें ॥ [2]
वेद पुरान श्री भागवत भाखे, कियो भक्तन मन भायो।
परमानन्द! इंद्र सो वैभव, विप्र सुदामा पायो ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1302)
नंद लाल श्री कृष्ण से प्रेम करो! वह ही केवल हैं जो अच्छे और बुरे समय में जीव के साथ सदा रहते हैं । उनकी कृपा से ही हम जीवित हैं । [1]
वह सेवा और स्मरण के महत्व को पहचानने वाले परम उदार एवं चतुर चिंतामणि हैं । वे अंतर ह्रदय की जानने वाले हैं एवं सदा अपने हस्त कमल की छाया रखते हैं । [2]
वेद, पुराण, श्री भागवत आदि श्री कृष्ण द्वारा उनके भक्तों की सदा संरक्षण की लीलाओं का वर्णन करती हैं । श्री परमानंद दास कहते हैं कि निर्धन सुदामा को भगवान श्री कृष्ण ने कृपा करके इंद्र के समान वैभव प्रदान कर दिया था । [3]
प्रीति तो नंदनंदन सों कीजै ।
संपति विपति परे प्रतिपाले, कृपा करें तो जीजे ॥ [1]
परम उदार चतुर चिंतामणि, सेवा सुमिरन मानें ।
हस्त कमल की छाया राखत, अंतरगति की जानें ॥ [2]
वेद पुरान श्री भागवत भाखे, कियो भक्तन मन भायो।
परमानन्द! इंद्र सो वैभव, विप्र सुदामा पायो ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1302)
नंद लाल श्री कृष्ण से प्रेम करो! वह ही केवल हैं जो अच्छे और बुरे समय में जीव के साथ सदा रहते हैं । उनकी कृपा से ही हम जीवित हैं । [1]
वह सेवा और स्मरण के महत्व को पहचानने वाले परम उदार एवं चतुर चिंतामणि हैं । वे अंतर ह्रदय की जानने वाले हैं एवं सदा अपने हस्त कमल की छाया रखते हैं । [2]
वेद, पुराण, श्री भागवत आदि श्री कृष्ण द्वारा उनके भक्तों की सदा संरक्षण की लीलाओं का वर्णन करती हैं । श्री परमानंद दास कहते हैं कि निर्धन सुदामा को भगवान श्री कृष्ण ने कृपा करके इंद्र के समान वैभव प्रदान कर दिया था । [3]

