कामी कै प्रिय कामिनी, लोभी कै प्रिय दाम।
ऐसेहि भगवत रसिक कै, प्रिय श्री स्यामाँ-स्याम॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (8.7.1)
जैसे कामासक्त पुरुष को कामिनी अत्यंत प्रिय होती है और लोभी को धन अत्यंत प्रिय लगता है, उसी प्रकार रसिकों को श्री श्यामा-श्याम सहज भाव से प्रिय लगते हैं।
ऐसेहि भगवत रसिक कै, प्रिय श्री स्यामाँ-स्याम॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (8.7.1)
जैसे कामासक्त पुरुष को कामिनी अत्यंत प्रिय होती है और लोभी को धन अत्यंत प्रिय लगता है, उसी प्रकार रसिकों को श्री श्यामा-श्याम सहज भाव से प्रिय लगते हैं।

