साँचे हितू सु यही दृढ़ावैं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (110)

साँचे हितू सु यही दृढ़ावैं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (110)

साँचे हितू सु यही दृढ़ावैं ।
नित्त बिहार ठौर नित निरखैं वही कथा नित सुने सुनावैं ॥ [1]
ब्रजवासनि सौं प्रीति कर दृढ़ा निसबासर सुख समैं बितावैं ।
नागरिया कौं स्वपनैंहु में अब ब्रज तजिकैं अनत न लैजावैं ॥ [2]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (110)

जो अनन्य रसिक जन होते  होता है वह प्रिया प्रियतम के नित्य विहार को ही निरखता है एवं दिव्य दंपति की उसी प्रेम लीला को ही नित्य सुनता और सुनाता है । [1]

उनका ब्रजवासियों से ऐसा दृढ़ प्रेम होता है कि ब्रजवासियों के संग ही वे दिन रात बिताया करते हैं । श्री नागरीदास कहते हैं कि वे सपने में भी अब ब्रज को छोड़कर अन्य कहीं जाने की बात नहीं सोचते । [2]