स्यामा स्याम सरूप सर, परि स्वार्थ बिसरयौ जु ।
जाकौ मन आनन्दघन, वृन्दाविपिन हरयौ जु ॥
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (2)
जिस साधक के मन को श्री वृंदावन धाम रूपी आनंद-मेघ ने अपने वश में कर लिया है, वह सहज ही युगल किशोर श्री श्यामा-श्याम के रूप-रस-सागर में अपनी समस्त सुध-बुध भुलाकर निमग्न हो जाता है।
जाकौ मन आनन्दघन, वृन्दाविपिन हरयौ जु ॥
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (2)
जिस साधक के मन को श्री वृंदावन धाम रूपी आनंद-मेघ ने अपने वश में कर लिया है, वह सहज ही युगल किशोर श्री श्यामा-श्याम के रूप-रस-सागर में अपनी समस्त सुध-बुध भुलाकर निमग्न हो जाता है।

